मालवांचल मित्र, नीमच: देश में महिला सशक्तिकरण की गूंज संसद से लेकर सड़कों तक सुनाई दे रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कभी-कभी इस नारे को सवालों के कटघरे में खड़ा कर देती है। ताज़ा मामला नगर पालिका परिषद नीमच की पीआईसी (PIC) बैठक से सामने आया है, जहाँ लोकतंत्र के मंच पर एक अलग ही ‘स्क्रिप्ट’ चलती नजर आई।
बैठक का एजेंडा तो महिला सभापति के हाथ में होना चाहिए था, लेकिन चर्चा में “साहब” ज्यादा सक्रिय दिखे—और ये “साहब” कोई अधिकारी नहीं, बल्कि सभापति के पति बताए जा रहे हैं। एजेंडा हाथ में लेकर न सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराई गई, बल्कि हर विषय पर बेबाक (कभी-कभी मर्यादा से परे) राय भी रखी गई।
अब सवाल यह उठता है कि क्या यह वही मॉडल है, जिसे हम वर्षों से पंचायतों में “सरपंच पति” के नाम से जानते आए हैं? फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मंच थोड़ा बड़ा है और किरदार वही पुराना।
यह दृश्य कहीं न कहीं लोकप्रिय वेब सीरीज़ Panchayat की याद भी दिलाता है। इस सीरीज़ में गांव की प्रधान भले ही मंजू देवी हों, लेकिन असल फैसलों की कमान अक्सर उनके पति ब्रज भूषण दुबे के हाथ में दिखाई जाती है। कई बार बैठकों में वही बोलते हैं, वही निर्णय लेते हैं—और चुनी हुई प्रतिनिधि सिर्फ औपचारिक रूप से मौजूद रहती हैं।
नीमच की इस बैठक में भी कुछ वैसा ही “रियल लाइफ वर्जन” देखने को मिला, जहाँ लोकतंत्र का चेहरा महिला का है, लेकिन आवाज़ किसी और की सुनाई देती है।
नगर पालिका की अध्यक्ष स्वाति चोपड़ा की इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। वहीं सीएमओ दुर्गा बामनिया की ‘स्वीकृति’ इस साइलेंट स्क्रिप्ट को और मजबूती देती नजर आ रही है। सूत्र बताते हैं कि यह कोई पहली घटना नहीं, बल्कि बैठकों में इस तरह की ‘अनौपचारिक भागीदारी’ पहले भी देखी गई है।
लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का मतलब सिर्फ नाम या पद नहीं, बल्कि निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी होता है। लेकिन जब फैसलों के पीछे कोई ‘अनदेखा हाथ’ काम करता नजर आए, तो महिला सशक्तिकरण की परिभाषा खुद-ब-खुद धुंधली हो जाती है।
इधर, केंद्र सरकार के महिला सशक्तिकरण अभियानों और प्रस्तावित महिला आरक्षण बिल की बात करें तो यह घटनाक्रम उन प्रयासों पर भी सवाल खड़े करता है। क्या सिर्फ सीट आरक्षित कर देने से सशक्तिकरण पूरा हो जाता है, या फिर मानसिकता में बदलाव भी उतना ही जरूरी है?
नगर पालिका परिषद पहले ही हाल के MOU से जुड़े मुद्दों और आरोप-प्रत्यारोपों के कारण चर्चा में रही है। ऐसे में यह नया विवाद प्रशासन की कार्यशैली और पारदर्शिता दोनों पर सवालिया निशान लगा रहा है।
अब निगाहें नगर पालिका अध्यक्ष स्वाति चोपड़ा की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। क्या वे इस मुद्दे पर खुलकर सामने आएंगी, या फिर ‘चुप्पी’ ही इस कहानी का अगला अध्याय बनेगी?
लोकतंत्र की इस ‘मीटिंग’ में कुर्सियाँ भले ही महिलाओं के नाम पर आरक्षित हों, लेकिन माइक और फैसले अभी भी कहीं और से संचालित हो रहे हैं। फर्क बस इतना है—यह अब सिर्फ वेब सीरीज़ की कहानी नहीं रही, बल्कि हकीकत का हिस्सा बनती जा रही है।