विद्यालय बनाते-बनाते कहीं बचपन का मैदान ही न उजड़ जाए
लेखिका: प्रियंका कवीश्वर | मालवांचल मित्र
शहरों का विकास केवल सड़कों, पुलों और कंक्रीट की इमारतों से नहीं मापा जाता। किसी शहर की वास्तविक पहचान उसके खुले आसमान, हरियाली, सार्वजनिक स्थलों और उन मैदानों से भी होती है, जहाँ उसकी पीढ़ियाँ अपने बचपन और युवावस्था को आकार देती हैं। शहर की भौतिक संरचना जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका सामाजिक और प्राकृतिक परिवेश भी है। यही वह संतुलन है, जो किसी शहर को महज आबादी का विस्तार बनने से रोककर उसे एक जीवंत शहर का स्वरूप देता है।
इसी तारतम्य में नीमच शहर की बात की जाए तो नीमच कभी अपने खुलेपन, लाल माटी और सार्वजनिक मैदानों के लिए जाना जाता था। इसमें सबसे महत्वपूर्ण मैदान शहर के मध्य स्थित क्र. 2 का मैदान है, जहाँ सुबह की सैर से लेकर बच्चों की किलकारियों तक, क्रिकेट की गेंद से लेकर फुटबॉल की दौड़ तक को हमेशा जगह मिली है।
लेकिन विकास की बदलती परिभाषा में सबसे आसान निशाना अक्सर वही सार्वजनिक जमीन बनती है, जिसका कोई व्यक्तिगत मालिक नहीं होता।
सांदीपनि विद्यालय निर्माण के लिए जमीन की आवश्यकता होना स्वाभाविक है। साथ ही शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है। प्रश्न यह नहीं कि विकास होना चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि विकास की कीमत आखिर कौन चुकाए?
क्या विकास की अंधी दौड़ में सार्वजनिक उपयोग की जमीन ही इसलिए चुन ली जाए, क्योंकि वह खाली दिखाई देती है?
यह सोचने का विषय है कि जो जमीन वर्षों से बच्चों, युवाओं और आम नागरिकों के सामूहिक उपयोग में है, उसे किसी नए निर्माण के लिए चुनते समय क्या उसके सामाजिक मूल्य का भी आंकलन किया गया ?
यह मैदान सिर्फ भूखंड का टुकड़ा नहीं है। यह बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की पहली पाठशाला भी है।
यही वह प्लेटफॉर्म होता है, जहाँ बच्चे जीत का उत्साह तो कभी हार स्वीकारना सीखते हैं। यही बच्चों में टीम भावना जन्म लेती है। इसी मैदान में बच्चे अनुशासन, धैर्य और आत्मनिर्भरता का पाठ सीखते हैं। प्रकारांतर से देखा जाए तो यह खेल मैदान शहर की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जहाँ लोगों को बिना किसी शुल्क के व्यायाम, खेल और खुली हवा का अवसर मिलता है। इसलिए इस मैदान को केवल ‘खाली जमीन’ मानना उसके वास्तविक महत्व को कम करके आंकना है।
यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि सांदीपनि विद्यालय न बने। इस महत्वपूर्ण आवश्यकता से किसी की असहमति नहीं हो सकती।
लेकिन निर्माण का मंतव्य यदि सुविधाओं में वृद्धि करना है, तो एक सुविधा के निर्माण के लिए दूसरी मौजूदा सुविधा को समाप्त करना कितना तर्कसंगत है—यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि इस मैदान में सांदीपनि विद्यालय बनता है और उसके लिए बच्चों का ही खेल मैदान समाप्त हो जाता है, तो क्या हमने वास्तव में बच्चों के हित में विकास किया?
आज विद्यालय के लिए मैदान गया, कल किसी अन्य संस्था के लिए कोई दूसरा सार्वजनिक स्थल चला गया और फिर भविष्य में किसी तीसरी आवश्यकता के लिए कोई और जमीन तलाश ली जाएगी, तो इस सिलसिले का अंत कहाँ होगा?
यही वह बिंदु है, जहाँ हमें तात्कालिक आवश्यकता से आगे बढ़कर दूरगामी परिप्रेक्ष्य में विचार करना होगा।
नीमच जैसे बढ़ते शहर में जमीन की उपलब्धता का प्रश्न आज नहीं तो कल और गंभीर होना ही है। इसलिए जरूरी है कि शहर के पास उपलब्ध शासकीय भूमि, विवादित भूखंडों, अतिक्रमित जमीनों और मास्टर प्लान में प्रस्तावित क्षेत्रों का समग्र पुनर्मूल्यांकन किया जाए।
यदि कहीं वर्षों से सरकारी जमीन विवादों में उलझी है, कहीं अतिक्रमण है और कहीं भूमि उपयोग का नियोजन कागजों तक सीमित है, तो उसका समाधान किया जाना चाहिए।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल निर्माण के लिए जमीन तलाशना नहीं, बल्कि शहर के भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भूमि का दीर्घकालीन नियोजन करना भी है।
आज किसी मैदान को बचाने का अर्थ विकास रोकना नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विकास ऐसा हो, जिसमें वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए जगह बची रहे।
एक पीढ़ी के लिए मैदान समाप्त करना आसान हो सकता है, लेकिन अगली पीढ़ी के लिए नया मैदान बनाना उतना आसान नहीं होगा। शहर के बीचोंबीच उपलब्ध विशाल सार्वजनिक भूमि को एक बार कंक्रीट में बदल दिया गया, तो उसे फिर से मैदान में बदलना लगभग असंभव होगा।
नीमच को आधुनिक विद्यालय चाहिए। निश्चित रूप से चाहिए। लेकिन उसके साथ आधुनिक खेल परिसर भी चाहिए। बेहतर शिक्षा चाहिए, तो बेहतर स्वास्थ्य और खेल सुविधाएँ भी चाहिए। स्मार्ट शहर की कल्पना है, तो उसके भीतर साँस लेने और खेलने की जगह भी होनी चाहिए।
इसीलिए किसी भी सार्वजनिक मैदान को बचाने की मांग को विकास विरोधी दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। यह शहर के संतुलित विकास की मांग है।
नीमच का विकास हो, नए विद्यालय बनें, नई शिक्षण संस्थाएँ आएँ, शहर आगे बढ़े लेकिन इस विकास यात्रा में शहर की खुली साँसें बंद न हों।
आज जरूरत किसी एक संस्था या किसी एक निर्माण का विरोध करने से अधिक व्यापक सोच की है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन वैकल्पिक स्थलों की तलाश करे, उपलब्ध शासकीय भूमि का समुचित उपयोग करे और शहर के महत्वपूर्ण सार्वजनिक मैदानों को स्थायी रूप से संरक्षित करने की नीति बनाए।
मैदान रहेंगे, तो बचपन मुस्कुराएगा,
बच्चे खेलेंगे, तो शहर खिलखिलाएगा।
खुले मैदानों से शहर का जीवन सजता है,
बचपन बचेगा, तो शहर भी बच पाएगा।