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  • शहर : पद और उसका मायाजाल - ओमप्रकाश चौधरी

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    शहर
    शहर   - नीमच[23-05-2026]
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  • मालवांचल मित्र, (ओमप्रकाश चौधरी):  पद और उसके लिए दीवानगी भी अजीब होती है। यह यदि एक बार किसी व्यक्ति पर हावी हो जाए तो उसे उसके सिवा और कुछ नहीं सूझता। यदि पद उसके पास है तो वह हर कीमत पर उसे बनाए रखने की कोशिश करता रहता है, और यदि नहीं है तो उसे पाने के लिए सारे द्राविड़ी प्राणायाम करने से भी नहीं चूकता।

    गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है—
    “को अस जन्मा जग माहीं, प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं।”
    अर्थात् पद और अहंकार का संबंध चोली-दामन जैसा है।

    पद और उससे मिली सत्ता का अहंकार जब सिर चढ़कर बोलता है तो व्यक्ति को अपनी गलतियाँ भी दिखाई नहीं देतीं। वही गलतियाँ एक दिन उसे ले डूबती हैं, लेकिन तब भी वह अपने पतन का दोष दूसरों पर मढ़ने से नहीं चूकता। विश्वास न हो तो राजनीति के अनेक उदाहरण देख लीजिए। सत्ता का मद ऐसा होता है कि जनता की नाराज़गी तक दिखाई नहीं देती। हार मिलने पर भी लोग कभी चुनाव आयोग को दोष देते हैं, कभी व्यवस्था को, और कभी विरोधियों को। कई बार तो पद छोड़ने में भी आनाकानी होती है और अंततः अपमानजनक विदाई झेलनी पड़ती है।

    दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो वर्षों तक पद के अभाव में जल बिन मछली की तरह तड़पते रहते हैं। वे अपनी योग्यता बढ़ाने के बजाय विरोधियों को नीचा दिखाने में ऊर्जा खर्च करते हैं। परिणामस्वरूप हार पर हार मिलती है, लेकिन उससे सीखने के बजाय उनकी बेचैनी और भाषा का स्तर दोनों गिरते जाते हैं।

    यह कहानी केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। जहाँ भी पद और उससे जुड़ी चमक-दमक है, वहाँ यह खेल जारी रहता है। एक पुराना किस्सा है—एक बाहुबली किसी संस्था का अध्यक्ष बन गया। बाद में जब भी चुनाव का अवसर आता, वह कह देता—“अध्यक्ष तो मैं ही हूँ, बाकी पदों पर चुनाव कर लो।” फिर वही होता जो अध्यक्ष महोदय चाहते।

    कई संस्थाओं में पदाधिकारी इस बहाने वर्षों तक जमे रहते हैं कि “मैं तो छोड़ना चाहता हूँ, पर कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार ही नहीं।” अब कोई उनसे पूछे कि जब वे नहीं रहेंगे तब संस्था कैसे चलेगी? लेकिन पद का मोह ऐसा होता है कि नया नेतृत्व तैयार करने के बजाय स्वयं ही कुर्सी से चिपके रहते हैं। ऐसे लोग वटवृक्ष की तरह होते हैं, जिनकी छाया में नया पौधा पनप ही नहीं पाता।

    कुछ लोग स्वयं को “किंगमेकर” के रूप में स्थापित कर लेते हैं। वे परदे के पीछे रहकर अपने इशारों पर चलने वालों को पद दिलाते हैं और फिर उन्हीं के माध्यम से सत्ता चलाते हैं। देश ने कठपुतली सत्ता का यह खेल पहले भी देखा है और उसकी कीमत भ्रष्टाचार के रूप में चुकाई है।

    कुछ लोगों की फितरत होती है कि वे किसी संस्था में तभी तक रहते हैं जब तक शीर्ष पद पर बने रहें। जैसे ही पद छिनता है, वे किसी बहाने अलग होकर नई संस्था बना लेते हैं और फिर उसके प्रमुख बन बैठते हैं। उनका यह क्रम निरंतर चलता रहता है।

    जब पद पाना ही जीवन का लक्ष्य बन जाए तो फिर हर तरीका उचित लगने लगता है। ऐसे लोग हमेशा इस प्रयास में रहते हैं कि अवसर मिलते ही कोई उनका नाम आगे बढ़ा दे। इसके लिए वे अपने कुछ समर्थक भी हमेशा तैयार रखते हैं। परंतु कभी-कभी ऐसा समय भी आता है जब उनका नाम प्रस्तावित करने वाला कोई नहीं मिलता। तब स्वयं ही प्रपंच रचने पड़ते हैं।

    पद के मायाजाल में उलझे व्यक्ति के लिए यदि किसी संस्था को विभाजित करना पड़े तो वह भी “धर्मसम्मत” प्रतीत होता है, क्योंकि उसका अस्तित्व ही पद से जुड़ा होता है। कई बार स्थिति “एक अनार, सौ बीमार” जैसी हो जाती है। पद एक-दो होते हैं, दावेदार अनेक, और सभी स्वयं को सबसे योग्य मानते हैं। ऐसे में उनकी प्रतिस्पर्धा देखने लायक होती है, और जो विजयी हो जाए वह स्वयं को मानो किला जीतने वाला समझता है।

    हालाँकि इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें किसी पद की चाह नहीं होती। वे केवल काम करने में विश्वास रखते हैं। पद के पीछे भागने वालों को ऐसे लोगों से कोई खतरा महसूस नहीं होता। वहीं कुछ बिरले व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं जिन्हें हर संस्था अपना प्रमुख बनाना गौरव की बात समझती है, क्योंकि उनका नेतृत्व ही सफलता की गारंटी माना जाता है। ऐसे लोग चाहें या न चाहें, पद स्वयं उनके पीछे चलते हैं। इन्हें “अध्यक्षों का अध्यक्ष” कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

    कुल मिलाकर पद और पदलोलुपता की महिमा अपरंपार है। पद वह फल है जिसे न पाने वाला पछता सकता है, पर पाने वाला शायद ही कभी पछताता हो। यदि पद किसी मलाईदार संस्था का हो तो फिर कहना ही क्या—सोने पर सुहागा।

    लेकिन पद का यह मायाजाल बड़ा विचित्र है। कुछ लोग जीवन भर पद पाने की कोशिश करते रहते हैं, फिर भी पद उनसे दूर ही रहता है। अंततः वे थक-हारकर कहते हैं—“मुझे तो कभी पद की चाह थी ही नहीं। हाँ, मिल जाता तो कुछ ऐसा कर जाता कि लोग याद रखते।”

    इसलिए पदाभिलाषी बनिए, पर पदलोलुप नहीं। आप जितना पद के पीछे भागेंगे, वह उतना दूर जाएगा। और जितना अपने काम पर ध्यान देंगे, उतना ही संभव है कि एक दिन पद स्वयं आपके पास चला आए।



  • शहर : पद और उसका मायाजाल - ओमप्रकाश चौधरी

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    शहर
    शहर   - नीमच[23-05-2026]
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    मालवांचल मित्र, (ओमप्रकाश चौधरी):  पद और उसके लिए दीवानगी भी अजीब होती है। यह यदि एक बार किसी व्यक्ति पर हावी हो जाए तो उसे उसके सिवा और कुछ नहीं सूझता। यदि पद उसके पास है तो वह हर कीमत पर उसे बनाए रखने की कोशिश करता रहता है, और यदि नहीं है तो उसे पाने के लिए सारे द्राविड़ी प्राणायाम करने से भी नहीं चूकता।

    गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है—
    “को अस जन्मा जग माहीं, प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं।”
    अर्थात् पद और अहंकार का संबंध चोली-दामन जैसा है।

    पद और उससे मिली सत्ता का अहंकार जब सिर चढ़कर बोलता है तो व्यक्ति को अपनी गलतियाँ भी दिखाई नहीं देतीं। वही गलतियाँ एक दिन उसे ले डूबती हैं, लेकिन तब भी वह अपने पतन का दोष दूसरों पर मढ़ने से नहीं चूकता। विश्वास न हो तो राजनीति के अनेक उदाहरण देख लीजिए। सत्ता का मद ऐसा होता है कि जनता की नाराज़गी तक दिखाई नहीं देती। हार मिलने पर भी लोग कभी चुनाव आयोग को दोष देते हैं, कभी व्यवस्था को, और कभी विरोधियों को। कई बार तो पद छोड़ने में भी आनाकानी होती है और अंततः अपमानजनक विदाई झेलनी पड़ती है।

    दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो वर्षों तक पद के अभाव में जल बिन मछली की तरह तड़पते रहते हैं। वे अपनी योग्यता बढ़ाने के बजाय विरोधियों को नीचा दिखाने में ऊर्जा खर्च करते हैं। परिणामस्वरूप हार पर हार मिलती है, लेकिन उससे सीखने के बजाय उनकी बेचैनी और भाषा का स्तर दोनों गिरते जाते हैं।

    यह कहानी केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। जहाँ भी पद और उससे जुड़ी चमक-दमक है, वहाँ यह खेल जारी रहता है। एक पुराना किस्सा है—एक बाहुबली किसी संस्था का अध्यक्ष बन गया। बाद में जब भी चुनाव का अवसर आता, वह कह देता—“अध्यक्ष तो मैं ही हूँ, बाकी पदों पर चुनाव कर लो।” फिर वही होता जो अध्यक्ष महोदय चाहते।

    कई संस्थाओं में पदाधिकारी इस बहाने वर्षों तक जमे रहते हैं कि “मैं तो छोड़ना चाहता हूँ, पर कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार ही नहीं।” अब कोई उनसे पूछे कि जब वे नहीं रहेंगे तब संस्था कैसे चलेगी? लेकिन पद का मोह ऐसा होता है कि नया नेतृत्व तैयार करने के बजाय स्वयं ही कुर्सी से चिपके रहते हैं। ऐसे लोग वटवृक्ष की तरह होते हैं, जिनकी छाया में नया पौधा पनप ही नहीं पाता।

    कुछ लोग स्वयं को “किंगमेकर” के रूप में स्थापित कर लेते हैं। वे परदे के पीछे रहकर अपने इशारों पर चलने वालों को पद दिलाते हैं और फिर उन्हीं के माध्यम से सत्ता चलाते हैं। देश ने कठपुतली सत्ता का यह खेल पहले भी देखा है और उसकी कीमत भ्रष्टाचार के रूप में चुकाई है।

    कुछ लोगों की फितरत होती है कि वे किसी संस्था में तभी तक रहते हैं जब तक शीर्ष पद पर बने रहें। जैसे ही पद छिनता है, वे किसी बहाने अलग होकर नई संस्था बना लेते हैं और फिर उसके प्रमुख बन बैठते हैं। उनका यह क्रम निरंतर चलता रहता है।

    जब पद पाना ही जीवन का लक्ष्य बन जाए तो फिर हर तरीका उचित लगने लगता है। ऐसे लोग हमेशा इस प्रयास में रहते हैं कि अवसर मिलते ही कोई उनका नाम आगे बढ़ा दे। इसके लिए वे अपने कुछ समर्थक भी हमेशा तैयार रखते हैं। परंतु कभी-कभी ऐसा समय भी आता है जब उनका नाम प्रस्तावित करने वाला कोई नहीं मिलता। तब स्वयं ही प्रपंच रचने पड़ते हैं।

    पद के मायाजाल में उलझे व्यक्ति के लिए यदि किसी संस्था को विभाजित करना पड़े तो वह भी “धर्मसम्मत” प्रतीत होता है, क्योंकि उसका अस्तित्व ही पद से जुड़ा होता है। कई बार स्थिति “एक अनार, सौ बीमार” जैसी हो जाती है। पद एक-दो होते हैं, दावेदार अनेक, और सभी स्वयं को सबसे योग्य मानते हैं। ऐसे में उनकी प्रतिस्पर्धा देखने लायक होती है, और जो विजयी हो जाए वह स्वयं को मानो किला जीतने वाला समझता है।

    हालाँकि इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें किसी पद की चाह नहीं होती। वे केवल काम करने में विश्वास रखते हैं। पद के पीछे भागने वालों को ऐसे लोगों से कोई खतरा महसूस नहीं होता। वहीं कुछ बिरले व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं जिन्हें हर संस्था अपना प्रमुख बनाना गौरव की बात समझती है, क्योंकि उनका नेतृत्व ही सफलता की गारंटी माना जाता है। ऐसे लोग चाहें या न चाहें, पद स्वयं उनके पीछे चलते हैं। इन्हें “अध्यक्षों का अध्यक्ष” कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

    कुल मिलाकर पद और पदलोलुपता की महिमा अपरंपार है। पद वह फल है जिसे न पाने वाला पछता सकता है, पर पाने वाला शायद ही कभी पछताता हो। यदि पद किसी मलाईदार संस्था का हो तो फिर कहना ही क्या—सोने पर सुहागा।

    लेकिन पद का यह मायाजाल बड़ा विचित्र है। कुछ लोग जीवन भर पद पाने की कोशिश करते रहते हैं, फिर भी पद उनसे दूर ही रहता है। अंततः वे थक-हारकर कहते हैं—“मुझे तो कभी पद की चाह थी ही नहीं। हाँ, मिल जाता तो कुछ ऐसा कर जाता कि लोग याद रखते।”

    इसलिए पदाभिलाषी बनिए, पर पदलोलुप नहीं। आप जितना पद के पीछे भागेंगे, वह उतना दूर जाएगा। और जितना अपने काम पर ध्यान देंगे, उतना ही संभव है कि एक दिन पद स्वयं आपके पास चला आए।

  • शहर: मशीनरी व्यापारी संघ के निर्वाचन निर्विरोध संपन्न, दिनेश मंडवारिया अध्यक्ष निर्वाचित

    शहर:
    शहर   - नीमच[30-08-2026]
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  • शहर: मशीनरी व्यापारी संघ के निर्वाचन निर्विरोध संपन्न, दिनेश मंडवारिया अध्यक्ष निर्वाचित

    मशीनरी व्यापारी संघ के निर्वाचन निर्विरोध संपन्न, दिनेश मंडवारिया अध्यक्ष निर्वाचित
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  • शहर: एमआर-10 फ्लाईओवर लगभग तैयार, अब मार्किंग-लाइटिंग की बारी; सितंबर में सर्विस रोड की मरम्मत

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    शहर   - इंदौर[29-08-2026]
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  • शहर: एमआर-10 फ्लाईओवर लगभग तैयार, अब मार्किंग-लाइटिंग की बारी; सितंबर में सर्विस रोड की मरम्मत

    एमआर-10 फ्लाईओवर लगभग तैयार, अब मार्किंग-लाइटिंग की बारी; सितंबर में सर्विस रोड की मरम्मत
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  • नीमच में ‘खेलो इंडिया संवाद’: प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं से कहा—एक खेल अपनाएं, अपना सर्वश्रेष्ठ दें

    नीमच में ‘खेलो इंडिया संवाद’:
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     प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं से कहा—एक खेल अपनाएं, अपना सर्वश्रेष्ठ दें
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  • शहर: जय श्री गणेश बस ने यात्रियों को नीमच की जगह निम्बाहेड़ा उतारा, फिर 40 मिनट खड़े होकर सफर

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  • शहर: जय श्री गणेश बस ने यात्रियों को नीमच की जगह निम्बाहेड़ा उतारा, फिर 40 मिनट खड़े होकर सफर

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  • शहर: इंदौर कलेक्टर कार्यालय में ABVP कार्यकर्ताओं का हंगामा, बैरिकेड तोड़कर परिसर में घुसे

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  • शहर: सावन की हरियाली में सजा उत्सव, महिलाओं ने जमकर बिखेरा रंग और उमंग

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  • शहर: सावन की हरियाली में सजा उत्सव, महिलाओं ने जमकर बिखेरा रंग और उमंग

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  • शहर: बचपन को खुला आसमान चाहिए, खेल के लिए खुले मैदान

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  • शहर: ज्ञानोदय इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी में नई शुरुआत, नए सपनों के साथ ‘Pharma Futurum’ का आगाज

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  • शहर: बालकवि बैरागी टीचर एजुकेशन रिसर्च सेंटर में इंडक्शन प्रोग्राम, नवागत विद्यार्थियों का आत्मीय स्वागत

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  • शहर: नीमच को एयर एम्बुलेंस योजना का लाभ क्यों नहीं मिला? कौन जिम्मेदार—पूर्व विधायक डॉ. सम्पत स्वरूप जाजू ने उठाए सवाल

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  • शहर: नीमच को एयर एम्बुलेंस योजना का लाभ क्यों नहीं मिला? कौन जिम्मेदार—पूर्व विधायक डॉ. सम्पत स्वरूप जाजू ने उठाए सवाल

    नीमच को एयर एम्बुलेंस योजना का लाभ क्यों नहीं मिला? कौन जिम्मेदार—पूर्व विधायक डॉ. सम्पत स्वरूप जाजू ने उठाए सवाल
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  • शहर: सेवा प्रकल्प से इनरव्हील ने जीता बच्चों का दिल, पौधों के साथ बांटी खुशियां

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  • 58 किलो डोडाचूरा के साथ दो तस्कर गिरफ्तार: बिना नंबर की बाइक ने खोला राज, पुलिस ने रास्ते में ही दबोचा

    58 किलो डोडाचूरा के साथ दो तस्कर गिरफ्तार:
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  • 58 किलो डोडाचूरा के साथ दो तस्कर गिरफ्तार: बिना नंबर की बाइक ने खोला राज, पुलिस ने रास्ते में ही दबोचा

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  • ईमानदारी अभी जिंदा है: चीताखेड़ा के नवनीत सेन परमार ने लौटाई ₹4300 की थैली, मंदिर परिसर में सौंपी रकमईमानदारी अभी जिंदा है: चीताखेड़ा के नवनीत सेन परमार ने लौटाई ₹4300 की थैली, मंदिर परिसर में सौंपी रकम

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  • शहर: विद्यार्थी परिषद से युवा मोर्चा तक सक्रिय रहे अभिषेक कोठारी, अब निभाएंगे सांसद प्रतिनिधि की जिम्मेदारी

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  • शहर: खेल का मैदान बचाने सड़क पर उतरे खिलाड़ी, कहा—अगर मैदान छिनेंगे तो सड़कें ही बनेंगी पिच

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