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  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज : कच्ची कैरी और बचपन की यादें

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    90s का सबसे खट्टा-मीठा राज
    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
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  • मालवांचल मित्र, संपादकीय:

    कच्ची कैरी पर नमक-मिर्च…
    ये सिर्फ एक स्वाद नहीं, एक पूरा ज़माना है—जो जीभ से शुरू होकर सीधे दिल तक उतर जाता है।

    वो गर्मियों की लंबी-लंबी दोपहरें…
    जब सूरज जैसे आसमान में ठहर जाता था और घरों की छतें तपने लगती थीं। माँ बार-बार आवाज़ देती—“बाहर मत घूमो, लू लग जाएगी…” लेकिन हम कहाँ मानने वाले थे। गली में दोस्तों की टोली तैयार रहती—किसी के हाथ में बल्ला, किसी के पास पुरानी गेंद, और किसी के मन में बस एक ही ख्याल—आज कैरी खानी है।

    गाँव हो या शहर की छोटी गली, हर जगह एक जाना-पहचाना ठेला होता था। लकड़ी की पेटी पर रखी हरी-हरी कच्ची कैरियाँ, जिनकी खुशबू दूर से ही खींच लाती थी। ठेले वाले भैया का अंदाज़ भी अलग होता था—एक हाथ में चाकू, दूसरे में नमक-मिर्च की छोटी-सी डिब्बी।

    “भैया, ज्यादा मिर्च डालना…”
    “मेरे में नमक थोड़ा कम…”
    हर किसी की अपनी फरमाइश, और हर प्लेट में अलग-अलग अंदाज़।

    चाकू की “चक-चक” आवाज़ के साथ कैरी के पतले-पतले टुकड़े बनते, फिर उस पर नमक और लाल मिर्च का जादू बिखरता। कभी-कभी वो ऊपर से थोड़ा चाट मसाला भी डाल देता—और हमें लगता जैसे किसी पाँच सितारा होटल की सबसे खास डिश मिल गई हो।

    पहला टुकड़ा जैसे ही मुँह में जाता—एकदम से खट्टापन, आँखें अपने आप बंद हो जातीं… चेहरे पर अजीब-सी सिकुड़न और फिर अचानक हँसी फूट पड़ती। दोस्त एक-दूसरे को देखकर खिलखिलाते—“अरे तेरे चेहरे को क्या हो गया!”
    लेकिन अगला टुकड़ा फिर भी बिना रुके खा लेते।

    कभी पैसे कम पड़ जाते तो चार लोग मिलकर एक ही पुड़िया बाँट लेते। कोई बड़ा टुकड़ा उठा लेता तो छोटा वाला नाराज़ हो जाता—“अरे बराबर बाँट ना!”
    और फिर वही छोटी-छोटी नोकझोंक, जो कुछ ही सेकंड में फिर हँसी में बदल जाती।

    कभी-कभी हम खुद ही पेड़ पर चढ़ जाते—कच्ची कैरी तोड़ने के लिए। नीचे खड़े दोस्त चिल्लाते—“अरे वो वाली तोड़, बड़ी है!”
    और जैसे ही कोई कैरी नीचे गिरती, सब उसे पकड़ने दौड़ पड़ते—जैसे कोई खजाना मिल गया हो।

    घर आकर माँ डाँटती—“कितनी बार कहा है, कच्चा मत खाया करो…”
    लेकिन उसी माँ के हाथों की कच्ची कैरी की चटनी और अचार सबसे ज्यादा पसंद होते थे। वो खट्टापन, वो मसालों की खुशबू… आज भी याद आते ही मुँह में पानी आ जाता है।

    उस वक्त ना कोई सोशल मीडिया था, ना कोई स्टेटस अपडेट।
    हमारे “स्टेटस” बस चेहरे पर लिखे होते थे—खुशी, मस्ती और बेफिक्री के।

    आज जब वही कैरी हम किसी बड़े मॉल से खरीदते हैं, साफ-सुथरे पैकेट में, मापे हुए मसालों के साथ—तो स्वाद तो मिलता है, लेकिन वो बात नहीं होती।
    क्योंकि उस समय कैरी के साथ जो मिला करता था—वो था अपनापन, दोस्ती, और वो मासूमियत… जो अब कहीं खो सी गई है।

    कच्ची कैरी पर नमक-मिर्च आज भी वही है—खट्टा, तीखा, मज़ेदार…
    पर उसे खाने वाले हम अब वो नहीं रहे।

    फिर भी, कभी अकेले में या दोस्तों के साथ, अगर आप एक कच्ची कैरी लें… उस पर हल्का सा नमक और लाल मिर्च छिड़कें… और एक टुकड़ा मुँह में रखें—
    तो यकीन मानिए, वक्त कुछ पल के लिए पीछे मुड़ जाएगा।

    शायद आप फिर वही बन जाएँ—नंगे पाँव दौड़ता हुआ बच्चा,
    जिसकी जेब में सिक्के कम थे,
    पर खुशियाँ बेहिसाब थीं।







  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज : कच्ची कैरी और बचपन की यादें

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    90s का सबसे खट्टा-मीठा राज
    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
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    मालवांचल मित्र, संपादकीय:

    कच्ची कैरी पर नमक-मिर्च…
    ये सिर्फ एक स्वाद नहीं, एक पूरा ज़माना है—जो जीभ से शुरू होकर सीधे दिल तक उतर जाता है।

    वो गर्मियों की लंबी-लंबी दोपहरें…
    जब सूरज जैसे आसमान में ठहर जाता था और घरों की छतें तपने लगती थीं। माँ बार-बार आवाज़ देती—“बाहर मत घूमो, लू लग जाएगी…” लेकिन हम कहाँ मानने वाले थे। गली में दोस्तों की टोली तैयार रहती—किसी के हाथ में बल्ला, किसी के पास पुरानी गेंद, और किसी के मन में बस एक ही ख्याल—आज कैरी खानी है।

    गाँव हो या शहर की छोटी गली, हर जगह एक जाना-पहचाना ठेला होता था। लकड़ी की पेटी पर रखी हरी-हरी कच्ची कैरियाँ, जिनकी खुशबू दूर से ही खींच लाती थी। ठेले वाले भैया का अंदाज़ भी अलग होता था—एक हाथ में चाकू, दूसरे में नमक-मिर्च की छोटी-सी डिब्बी।

    “भैया, ज्यादा मिर्च डालना…”
    “मेरे में नमक थोड़ा कम…”
    हर किसी की अपनी फरमाइश, और हर प्लेट में अलग-अलग अंदाज़।

    चाकू की “चक-चक” आवाज़ के साथ कैरी के पतले-पतले टुकड़े बनते, फिर उस पर नमक और लाल मिर्च का जादू बिखरता। कभी-कभी वो ऊपर से थोड़ा चाट मसाला भी डाल देता—और हमें लगता जैसे किसी पाँच सितारा होटल की सबसे खास डिश मिल गई हो।

    पहला टुकड़ा जैसे ही मुँह में जाता—एकदम से खट्टापन, आँखें अपने आप बंद हो जातीं… चेहरे पर अजीब-सी सिकुड़न और फिर अचानक हँसी फूट पड़ती। दोस्त एक-दूसरे को देखकर खिलखिलाते—“अरे तेरे चेहरे को क्या हो गया!”
    लेकिन अगला टुकड़ा फिर भी बिना रुके खा लेते।

    कभी पैसे कम पड़ जाते तो चार लोग मिलकर एक ही पुड़िया बाँट लेते। कोई बड़ा टुकड़ा उठा लेता तो छोटा वाला नाराज़ हो जाता—“अरे बराबर बाँट ना!”
    और फिर वही छोटी-छोटी नोकझोंक, जो कुछ ही सेकंड में फिर हँसी में बदल जाती।

    कभी-कभी हम खुद ही पेड़ पर चढ़ जाते—कच्ची कैरी तोड़ने के लिए। नीचे खड़े दोस्त चिल्लाते—“अरे वो वाली तोड़, बड़ी है!”
    और जैसे ही कोई कैरी नीचे गिरती, सब उसे पकड़ने दौड़ पड़ते—जैसे कोई खजाना मिल गया हो।

    घर आकर माँ डाँटती—“कितनी बार कहा है, कच्चा मत खाया करो…”
    लेकिन उसी माँ के हाथों की कच्ची कैरी की चटनी और अचार सबसे ज्यादा पसंद होते थे। वो खट्टापन, वो मसालों की खुशबू… आज भी याद आते ही मुँह में पानी आ जाता है।

    उस वक्त ना कोई सोशल मीडिया था, ना कोई स्टेटस अपडेट।
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    आज जब वही कैरी हम किसी बड़े मॉल से खरीदते हैं, साफ-सुथरे पैकेट में, मापे हुए मसालों के साथ—तो स्वाद तो मिलता है, लेकिन वो बात नहीं होती।
    क्योंकि उस समय कैरी के साथ जो मिला करता था—वो था अपनापन, दोस्ती, और वो मासूमियत… जो अब कहीं खो सी गई है।

    कच्ची कैरी पर नमक-मिर्च आज भी वही है—खट्टा, तीखा, मज़ेदार…
    पर उसे खाने वाले हम अब वो नहीं रहे।

    फिर भी, कभी अकेले में या दोस्तों के साथ, अगर आप एक कच्ची कैरी लें… उस पर हल्का सा नमक और लाल मिर्च छिड़कें… और एक टुकड़ा मुँह में रखें—
    तो यकीन मानिए, वक्त कुछ पल के लिए पीछे मुड़ जाएगा।

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  • संपादकीय: क्या हमारी पसंद सच में हमारी है—या हमें “पसंद करना” सिखाया जा रहा है?

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[30-04-2026]
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  • संपादकीय: क्या हमारी पसंद सच में हमारी है—या हमें “पसंद करना” सिखाया जा रहा है?

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  • कैलाश विजयवर्गीय: जनजीवन से जुड़ा एक सक्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व

    कैलाश विजयवर्गीय:
    संपादकीय   - नीमच[19-04-2026]
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  • संपादकीय: मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य

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    संपादकीय   - नीमच[06-04-2026]
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  • संपादकीय: नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल

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  • संपादकीय: उद्योगों के नाम पर सरकारी जमीनों का हेरफेर

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  • संपादकीय: “सही करने” के नाम पर कमाई का माध्यम बनता एमओयू – आमजन की कीमत पर व्यवस्था का खेल

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    संपादकीय   - नीमच[26-03-2026]
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  • संपादकीय: 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष आरक्षण नहीं संरक्षण चाहिए मुफ्त की रेवड़ियाँ नहीं रोजगार चाहिए

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[07-03-2026]
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  • संपादकीय: करनाल में 75 वर्षीय डॉक्टर की दर्दनाक हालत – परिवार विदेश में, बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार | समाज के लिए बड़ा सवाल

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[26-02-2026]
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  • 24 फरवरी का इतिहास: नानाजी देशमुख का जन्म और RSS पर प्रतिबंध का प्रभाव

    24 फरवरी का इतिहास:
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  • 12वीं के बाद की राह: सपनों को दिशा देने का सही समय

    12वीं के बाद की राह:
    संपादकीय   - नीमच[22-02-2026]
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  • आज का दिन इतिहास में: विश्व सामाजिक न्याय दिवस

    आज का दिन इतिहास में:
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