मालवांचल मित्र, लेख (हरीश मंगल): 28 फरवरी 2026 को इजराइल और अमेरिका का ईरान के साथ प्रारम्भ हुआ संघर्ष एक महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद अब एक वैश्विक आर्थिक संकट में बदलता जा रहा है। यूं तो यह केवल तीन देशों के बीच चल रहा युद्ध है लेकिन अपने सामरिक महत्व के कारण इसने पूरे विश्व की आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चैन) को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इसी वजह से पूरी दुनिया में गंभीर ऊर्जा एवं आर्थिक संकट पैदा हो गया है। इजराइल एवं अमेरिका के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने के बाद ईरान द्वारा अमेरिका के मित्र देशों पर किये गए मिसाइल हमलों ने इस संकट को और ज्यादा गंभीर बना दिया है। ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिये जाने से स्थिति और ज्यादा विकट हो गई है। यह वही समुद्री मार्ग है जिससे होकर पूरी दुनिया का बहुत बड़ा आयात-निर्यात संचालित होता है। इस वैश्विक संकट का बहुत ही गंभीर प्रभाव भारत पर भी हुआ है।
भारत पर सबसे ज्यादा प्रभाव कच्चे तेल एवं गैस की आपूर्ति के संदर्भ में पड़ा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत के लिए पूरी तरह आयात पर ही निर्भर है। हम अपनी जरूरत का केवल 15% ही स्वदेश में उत्पादन कर पाते हैं, जबकि शेष 85% आयात किया जाता है। इस वर्तमान युद्ध ने जहाँ एक ओर भारत के लिए पेट्रोलियम का गंभीर संकट पैदा कर दिया है, वहीं केन्द्र सरकार के दूरदर्शितापूर्ण निर्णयों के कारण आम जनता पर फिलहाल इसका ज्यादा बोझ नहीं पड़ा है। विश्व के लगभग 100 से ज्यादा देशों में पेट्रोल-डीजल का मूल्य बढ़ चुका है, लेकिन भारत में अभी भी यह पुरानी दरों पर ही उपलब्ध है। घरेलू गैस सिलेंडर की आपूर्ति भी लगभग सामान्य रूप से हो रही है।
हालांकि, व्यवसायिक रूप से उपयोग होने वाली गैस एवं डीजल के भाव इस युद्ध के बाद बहुत ज्यादा बढ़ चुके हैं, जिससे गैस आधारित कई व्यवसाय संकट में फंस चुके हैं। हॉर्मुज मार्ग बंद होने से भारत के कृषि उत्पाद एवं अन्य कई वस्तुओं के निर्यात पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। किसानों के लिए यह एक कठिन समय है, लेकिन भारत की घरेलू मांग बहुत मजबूत होने से इस निर्यात अवरोध का बहुत ज्यादा प्रभाव फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा है।
इस कठिन समय में जहाँ पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की आशंका से सहमी हुई है, वहीं भारत में इसका प्रभाव सीमित ही दिखाई दे रहा है। आयात प्रभावित होने से रसायन, मेटल और प्लास्टिक व्यापार पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इस युद्ध के कारण शेयर बाजार बुरी तरह चरमरा गया है। विदेशी निवेशक भी अपना पूंजी निवेश सीमित करते जा रहे हैं, जिससे रुपया भी भारी दबाव में है। पिछले दिनों रुपया अपने सबसे निचले स्तर तक पहुंच गया था। कई अर्थशास्त्री इससे भारत की GDP में गिरावट की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी इस संकट के कारण नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
ऐसे में सरकार पर भारी दबाव है। एक तरफ महंगे पेट्रोल-डीजल की समस्या से देश की जनता को बचाना है, तो दूसरी तरफ तेल की आपूर्ति को भी सुगम रखना है। किसानों के लिए उर्वरक भी सुलभ करना है, तो आम जनता तक रसोई गैस की पर्याप्त उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी है। इस प्रकार के संकट में सरकार की सबसे बड़ी चिंता है महंगाई को नियंत्रण में रखना और स्थानीय व्यापार को प्रभावित न होने देना। सरकार अपने स्तर पर इन समस्याओं से निपटने का प्रयास कर ही रही है, लेकिन इसमें देश के नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सरकार उपरोक्त युद्ध से उत्पन्न संकट से निपटने के प्रयास अपने स्तर पर कर ही रही है, लेकिन भारत के आम नागरिक की भी इसमें महती भूमिका है। नागरिकों को चाहिए कि तेल, गैस, अनाज, दवाई आदि का बेमतलब भंडारण न करें। किसी भी तरह की अफवाह पर भरोसा करके भगदड़ भरी खरीदारी या बिकवाली से बचें। सरकार द्वारा समय-समय पर प्रसारित सूचनाओं का पालन करें एवं अविश्वसनीय स्रोतों द्वारा प्रसारित किसी भी सूचना को पहले जांच लें, फिर ही उस पर अमल करें।
आज दुनिया एक गंभीर संकट से जूझ रही है। ऐसे में हमारा राष्ट्र भी इससे अछूता नहीं है। यह ऐसा युद्ध है जिसमें भले ही तीन ही देश सम्मिलित हैं, लेकिन इसके दुष्प्रभाव पूरे विश्व को कष्ट दे रहे हैं। भारत अपनी विशाल जनसंख्या एवं मजबूत लोकतंत्र के साथ इस संकट से अवश्य ही सकुशल बाहर निकलेगा, लेकिन तब तक के लिए हमें धैर्य रखना होगा और अपनी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना ही होगा।