• संपादकीय : 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष आरक्षण नहीं संरक्षण चाहिए मुफ्त की रेवड़ियाँ नहीं रोजगार चाहिए

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[07-03-2026]
  • मालवांचल मित्र, नीमच (कल्पना मोगरा): निःसंदेह नई सहस्राब्दी में नारी के प्रति पुरुष समाज के सहयोगात्मक व उत्साहवर्धनात्मक व्यवहार से देश के विकास व उन्नति में नारी की एक सर्वदा नई छवि उभर कर सामने आई है।

    कहीं घूंघट में छिपकर दबे-सहमे कदमों को पुरुष के साथ मिलाते हुए, तो कहीं रूढ़ियों से लड़ते हुए भारतीय नारी ने सदियों के संघर्षों की आग में तप कर अपने आप को सोना बनाया है।

    वहीं महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से लागू की गई प्रशासनिक योजनाओं जैसे —
    ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘मिशन शक्ति’, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’, ‘उज्ज्वला योजना’ — से महिलाओं को सुरक्षा के साथ-साथ अच्छा स्वास्थ्य, शिक्षा, हुनर, रोजगार और नेतृत्व के अवसर मिले हैं।

    प्रधानमंत्री आवास योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और कृषि सहायता योजनाओं ने महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक मजबूती दी है।

    आज महिलाएं पंचायत से लेकर सेना और अंतरिक्ष अनुसंधान तक हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। चंद्रयान-3 मिशन में भी महिला वैज्ञानिकों की अहम भूमिका रही।

    इतना ही नहीं, आज की भारतीय महिलाएं वैज्ञानिक, उद्यमी, सैनिक, शिक्षिका और नेता के रूप में भारत की आकांक्षाओं की प्रतीक बन चुकी हैं।

    बावजूद इसके, संघर्ष का एक लंबा सफर तय करने के बाद भी कदम-दर-कदम सफलता की सीढ़ियां चढ़ने वाली भारतीय नारी की पूर्ण सुरक्षित और सशक्त नारी की परिकल्पना अभी भी अधूरी, अपरिपक्व और अपूर्ण है।

    हमारे देश में प्रतिवर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हुए महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु नई-नई नीतियां बनाई जाती हैं, नए-नए अधिकार दिए जाते हैं, प्रण किए जाते हैं, वादे किए जाते हैं — महिला विकास के, महिला आरक्षण के।

    किन्तु मैं यह पूछना चाहती हूं कि क्या शिक्षा, रोजगार व राजनीति में 33% आरक्षण दे देने से, या मुफ्त की रेवड़ी के रूप में उनके खाते में नगद राशि जमा कर देने से महिला सशक्तिकरण संभव है?

    जी नहीं! हरगिज़ नहीं!

    आज नारी ने धरती से लेकर आकाश तक हर क्षेत्र में अपनी सफलता का परचम फहराया है। लेकिन विडंबना देखिए कि धरती की सीमाओं को लांघकर आकाश की बुलंदियों को छूने वाली नारियों के इस देश में आज भी नारी घर की दहलीज के बाहर ही नहीं, घर के अंदर भी सुरक्षित नहीं है।

    सो अनेक सवाल मन में उपस्थित होते हैं —
    क्यों कानून के विरुद्ध चोरी-छुपे आज भी लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या जारी है?

    क्यों आज सिर्फ नारी ही नहीं, अपितु 2-4 साल की मासूम बच्चियां भी पुरुष की हवस का शिकार हो रही हैं?

    क्यों आज नारी की स्मिता तार-तार हो रही है?

    क्यों आज भी सभ्य परिवारों की महिलाएं अपने ही परिवार के पुरुषों के अत्याचार का शिकार हो रही हैं?

    क्यों कठोर कानून बनने के बावजूद कोलकाता में महिला डॉक्टर के साथ रेप और मर्डर, मुंबई की श्रद्धा वाकर और यूपी की आयुषी की निर्मम हत्या जैसे अनेकों दिल दहला देने वाले कांड लगातार बढ़ते जा रहे हैं?

    ये घटनाएं एक संपूर्ण सशक्त, स्वतंत्र और आश्वस्त भारतीय नारी पर प्रश्नचिन्ह हैं।

    महिलाएं आज रात के अंधेरे में ही नहीं, दिन के उजाले में भी सुरक्षित नहीं हैं।
    महिलाओं के खून और आंसुओं से भीगे अखबार के पन्ने चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि पूर्ण महिला सशक्तिकरण की बात अभी भी एक ढोंग, एक दिखावा और एक प्रपंच मात्र है।

    महात्मा गांधी ने कहा था —
    “मैं भारत को सही मायने में उस दिन स्वतंत्र मानूंगा, जिस दिन इस देश की नारी आधी रात को भी सुरक्षित बाहर निकल सके।”

    रात का अंधेरा और दिन का उजाला तो छोड़िए, आज मां के गर्भ में भी नारी सुरक्षित नहीं है, और हम कहते हैं कि महिलाओं को 33% आरक्षण देकर सशक्त बनाएंगे!

    सही मायने में भारतीय नारी को पूर्ण सशक्त बनाने के लिए, सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए आरक्षण की नहीं, संरक्षण की आवश्यकता है।

    उसे समाज के हर क्षेत्र में सुरक्षा चाहिए।
    मां के गर्भ से जन्म लेने का अधिकार चाहिए।
    अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए शिक्षा चाहिए।
    कौशल विकास चाहिए।
    सम्मानजनक रोजगार के अवसर चाहिए।
    और इन सबके साथ चाहिए — सुरक्षा, आदर और सम्मान।

    नारी असुरक्षा की यह समस्या संपूर्ण समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसलिए पुरुष समाज के सहयोग के साथ-साथ नारी शक्ति को भी संगठित होकर नारी गरिमा, नारी सम्मान और नारी स्मिता की सुरक्षा के लिए आगे आना होगा।

    “नारी नारी की दुश्मन नहीं, अपितु सच्ची मित्र है” — इसे चरितार्थ करना होगा।

    जिस दिन इस देश की नारी अपनी शक्ति पहचान कर एकजुट होकर चल पड़ेगी, उस दिन उसकी शक्ति को रोक पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा।

    फिर उसे द्रौपदी बनकर किसी कृष्ण को पुकारना नहीं पड़ेगा,
    बल्कि दुर्गा बनकर वह अपनी रक्षा स्वयं कर सकेगी।

    एक मां के रूप में यह भी दायित्व है कि वह बचपन से ही अपने बेटों को नारी सम्मान के संस्कार दे, ताकि भविष्य में वह नारी के प्रति गलत सोच भी न रख सके।

    साथ ही बच्चों (बेटे और बेटियां दोनों) को प्रारंभ से योग, प्राणायाम और मेडिटेशन की शिक्षा देकर उन्हें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक रूप से सशक्त बनाया जाए।

    स्कूलों और कॉलेजों में भी इनकी शिक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए।

    छोटी बालिकाओं को गुड टच और बैड टच की जानकारी देना, महिला हेल्पलाइन, पेपर स्प्रे, माय सेफ्टी पिन, सुरक्षा अलार्म, डिजिटल सुरक्षा, शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाओं की जानकारी देना भी अत्यंत आवश्यक है।

    विद्यालयों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर समय-समय पर इन विषयों पर सेमिनार और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

    यदि ऐसा हो जाता है तो इस देश की महिलाओं में इतनी योग्यता और क्षमता है कि अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उन्हें 33% आरक्षण रूपी बैसाखी या मुफ्त की रेवड़ियों की आवश्यकता नहीं होगी।

    क्योंकि —

    परिंदों को ताली नहीं दी जाती उड़ानों की,
    वो खुद ही छू लेते हैं ऊंचाइयां आसमानों की।

    अतः आरक्षण और मुफ्त की रेवड़ियों रूपी सीढ़ियां उन्हें मुबारक हों जिन्हें सिर्फ छत तक जाना है।

    हम नारी रूपी परिंदों की मंज़िल तो आसमान है।
    वहां तक पहुंचने की योग्यता, प्रतिभा और सामर्थ्य हममें है, और वहां तक पहुंचने का रास्ता भी हम स्वयं बना लेंगी।

    बस हमें चाहिए —
    सुरक्षा, संरक्षण, सम्मान, शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य, कौशल विकास और सम्मानजनक रोजगार।

    तभी एक संपूर्ण सशक्त नारी की परिकल्पना साकार होगी और एक सशक्त, समृद्ध और विकसित भारत का निर्माण संभव होगा।

    — कल्पना मोगरा, नीमच



  • संपादकीय : 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष आरक्षण नहीं संरक्षण चाहिए मुफ्त की रेवड़ियाँ नहीं रोजगार चाहिए

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[07-03-2026]

    मालवांचल मित्र, नीमच (कल्पना मोगरा): निःसंदेह नई सहस्राब्दी में नारी के प्रति पुरुष समाज के सहयोगात्मक व उत्साहवर्धनात्मक व्यवहार से देश के विकास व उन्नति में नारी की एक सर्वदा नई छवि उभर कर सामने आई है।

    कहीं घूंघट में छिपकर दबे-सहमे कदमों को पुरुष के साथ मिलाते हुए, तो कहीं रूढ़ियों से लड़ते हुए भारतीय नारी ने सदियों के संघर्षों की आग में तप कर अपने आप को सोना बनाया है।

    वहीं महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से लागू की गई प्रशासनिक योजनाओं जैसे —
    ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘मिशन शक्ति’, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’, ‘उज्ज्वला योजना’ — से महिलाओं को सुरक्षा के साथ-साथ अच्छा स्वास्थ्य, शिक्षा, हुनर, रोजगार और नेतृत्व के अवसर मिले हैं।

    प्रधानमंत्री आवास योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और कृषि सहायता योजनाओं ने महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक मजबूती दी है।

    आज महिलाएं पंचायत से लेकर सेना और अंतरिक्ष अनुसंधान तक हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। चंद्रयान-3 मिशन में भी महिला वैज्ञानिकों की अहम भूमिका रही।

    इतना ही नहीं, आज की भारतीय महिलाएं वैज्ञानिक, उद्यमी, सैनिक, शिक्षिका और नेता के रूप में भारत की आकांक्षाओं की प्रतीक बन चुकी हैं।

    बावजूद इसके, संघर्ष का एक लंबा सफर तय करने के बाद भी कदम-दर-कदम सफलता की सीढ़ियां चढ़ने वाली भारतीय नारी की पूर्ण सुरक्षित और सशक्त नारी की परिकल्पना अभी भी अधूरी, अपरिपक्व और अपूर्ण है।

    हमारे देश में प्रतिवर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हुए महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु नई-नई नीतियां बनाई जाती हैं, नए-नए अधिकार दिए जाते हैं, प्रण किए जाते हैं, वादे किए जाते हैं — महिला विकास के, महिला आरक्षण के।

    किन्तु मैं यह पूछना चाहती हूं कि क्या शिक्षा, रोजगार व राजनीति में 33% आरक्षण दे देने से, या मुफ्त की रेवड़ी के रूप में उनके खाते में नगद राशि जमा कर देने से महिला सशक्तिकरण संभव है?

    जी नहीं! हरगिज़ नहीं!

    आज नारी ने धरती से लेकर आकाश तक हर क्षेत्र में अपनी सफलता का परचम फहराया है। लेकिन विडंबना देखिए कि धरती की सीमाओं को लांघकर आकाश की बुलंदियों को छूने वाली नारियों के इस देश में आज भी नारी घर की दहलीज के बाहर ही नहीं, घर के अंदर भी सुरक्षित नहीं है।

    सो अनेक सवाल मन में उपस्थित होते हैं —
    क्यों कानून के विरुद्ध चोरी-छुपे आज भी लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या जारी है?

    क्यों आज सिर्फ नारी ही नहीं, अपितु 2-4 साल की मासूम बच्चियां भी पुरुष की हवस का शिकार हो रही हैं?

    क्यों आज नारी की स्मिता तार-तार हो रही है?

    क्यों आज भी सभ्य परिवारों की महिलाएं अपने ही परिवार के पुरुषों के अत्याचार का शिकार हो रही हैं?

    क्यों कठोर कानून बनने के बावजूद कोलकाता में महिला डॉक्टर के साथ रेप और मर्डर, मुंबई की श्रद्धा वाकर और यूपी की आयुषी की निर्मम हत्या जैसे अनेकों दिल दहला देने वाले कांड लगातार बढ़ते जा रहे हैं?

    ये घटनाएं एक संपूर्ण सशक्त, स्वतंत्र और आश्वस्त भारतीय नारी पर प्रश्नचिन्ह हैं।

    महिलाएं आज रात के अंधेरे में ही नहीं, दिन के उजाले में भी सुरक्षित नहीं हैं।
    महिलाओं के खून और आंसुओं से भीगे अखबार के पन्ने चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि पूर्ण महिला सशक्तिकरण की बात अभी भी एक ढोंग, एक दिखावा और एक प्रपंच मात्र है।

    महात्मा गांधी ने कहा था —
    “मैं भारत को सही मायने में उस दिन स्वतंत्र मानूंगा, जिस दिन इस देश की नारी आधी रात को भी सुरक्षित बाहर निकल सके।”

    रात का अंधेरा और दिन का उजाला तो छोड़िए, आज मां के गर्भ में भी नारी सुरक्षित नहीं है, और हम कहते हैं कि महिलाओं को 33% आरक्षण देकर सशक्त बनाएंगे!

    सही मायने में भारतीय नारी को पूर्ण सशक्त बनाने के लिए, सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए आरक्षण की नहीं, संरक्षण की आवश्यकता है।

    उसे समाज के हर क्षेत्र में सुरक्षा चाहिए।
    मां के गर्भ से जन्म लेने का अधिकार चाहिए।
    अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए शिक्षा चाहिए।
    कौशल विकास चाहिए।
    सम्मानजनक रोजगार के अवसर चाहिए।
    और इन सबके साथ चाहिए — सुरक्षा, आदर और सम्मान।

    नारी असुरक्षा की यह समस्या संपूर्ण समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसलिए पुरुष समाज के सहयोग के साथ-साथ नारी शक्ति को भी संगठित होकर नारी गरिमा, नारी सम्मान और नारी स्मिता की सुरक्षा के लिए आगे आना होगा।

    “नारी नारी की दुश्मन नहीं, अपितु सच्ची मित्र है” — इसे चरितार्थ करना होगा।

    जिस दिन इस देश की नारी अपनी शक्ति पहचान कर एकजुट होकर चल पड़ेगी, उस दिन उसकी शक्ति को रोक पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा।

    फिर उसे द्रौपदी बनकर किसी कृष्ण को पुकारना नहीं पड़ेगा,
    बल्कि दुर्गा बनकर वह अपनी रक्षा स्वयं कर सकेगी।

    एक मां के रूप में यह भी दायित्व है कि वह बचपन से ही अपने बेटों को नारी सम्मान के संस्कार दे, ताकि भविष्य में वह नारी के प्रति गलत सोच भी न रख सके।

    साथ ही बच्चों (बेटे और बेटियां दोनों) को प्रारंभ से योग, प्राणायाम और मेडिटेशन की शिक्षा देकर उन्हें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक रूप से सशक्त बनाया जाए।

    स्कूलों और कॉलेजों में भी इनकी शिक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए।

    छोटी बालिकाओं को गुड टच और बैड टच की जानकारी देना, महिला हेल्पलाइन, पेपर स्प्रे, माय सेफ्टी पिन, सुरक्षा अलार्म, डिजिटल सुरक्षा, शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाओं की जानकारी देना भी अत्यंत आवश्यक है।

    विद्यालयों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर समय-समय पर इन विषयों पर सेमिनार और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

    यदि ऐसा हो जाता है तो इस देश की महिलाओं में इतनी योग्यता और क्षमता है कि अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उन्हें 33% आरक्षण रूपी बैसाखी या मुफ्त की रेवड़ियों की आवश्यकता नहीं होगी।

    क्योंकि —

    परिंदों को ताली नहीं दी जाती उड़ानों की,
    वो खुद ही छू लेते हैं ऊंचाइयां आसमानों की।

    अतः आरक्षण और मुफ्त की रेवड़ियों रूपी सीढ़ियां उन्हें मुबारक हों जिन्हें सिर्फ छत तक जाना है।

    हम नारी रूपी परिंदों की मंज़िल तो आसमान है।
    वहां तक पहुंचने की योग्यता, प्रतिभा और सामर्थ्य हममें है, और वहां तक पहुंचने का रास्ता भी हम स्वयं बना लेंगी।

    बस हमें चाहिए —
    सुरक्षा, संरक्षण, सम्मान, शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य, कौशल विकास और सम्मानजनक रोजगार।

    तभी एक संपूर्ण सशक्त नारी की परिकल्पना साकार होगी और एक सशक्त, समृद्ध और विकसित भारत का निर्माण संभव होगा।

    — कल्पना मोगरा, नीमच