• सुप्रभात : “बंदर की रोटी” — बचपन की यादों से जुड़ा वो अनमोल देसी फल, जो आज भी है सेहत का खजाना

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    सुप्रभात
    सुप्रभात   - नीमच[04-04-2026]
  • नीमच/मालवांचल क्षेत्र।
    गर्मी की शुरुआत होते ही पेड़ों पर लटकते कुछ अजीब से हरे फल बच्चों की उत्सुकता बढ़ा देते थे। गांव के रास्तों पर चलते हुए, खेतों के किनारे खेलते हुए या स्कूल से लौटते वक्त जैसे ही ये फल नजर आते, बचपन अपने आप लौट आता था। स्थानीय भाषा में इन्हें “बंदर की रोटी”, “बंदर पापड़ी” या “बंदर बाटी” कहा जाता है।

    यह कोई साधारण फल नहीं, बल्कि प्रकृति का अनोखा उपहार है, जिसका वैज्ञानिक नाम Holoptelea integrifolia है और अंग्रेजी में इसे Indian Elm कहा जाता है। मालवा, राजस्थान और गुजरात में इसे “चरेल” नाम से भी जाना जाता है।

    बचपन की वो मीठी यादें

    गांव के बच्चे अक्सर इन फलों को तोड़कर उनके पत्तीनुमा छिलकों को हटाते और अंदर से निकलने वाली “मींगी” (बीज का गूदा) को बड़े चाव से खाते थे। स्वाद हल्का मीठा और अलग ही होता था — जैसे कोई देसी टॉफी मिल गई हो।

    बुजुर्ग बताते हैं कि पेड़ों पर बैठे लंगूर भी इस फल को बड़े शौक से खाते हैं। खास बात यह भी कही जाती है कि मादा लंगूर प्रसव के बाद इस फल का सेवन करती हैं, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

    पूरे भारत में मिलता है यह पेड़

    यह पेड़ लगभग पूरे भारत में पाया जाता है और अलग-अलग राज्यों में इसके अलग नाम हैं — जैसे चिलबिल, सिलबिल, धाम्ना, वावली पापड़ा, निलावही आदि। जनवरी-फरवरी में इसमें फूल आते हैं और फरवरी से अप्रैल के बीच इसके फल दिखाई देते हैं।

    औषधीय गुणों से भरपूर

    जहां एक ओर यह फल बचपन की यादों से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर आयुर्वेद में इसे बेहद उपयोगी माना गया है—

    पेड़ की छाल का लेप गठिया में उपयोगी
    पत्तियों का काढ़ा मेटाबॉलिज्म सुधारने में सहायक
    पत्तियों का लेप दाद, एक्जिमा जैसे त्वचा रोगों में लाभकारी
    छाल का उपयोग आंतों के छाले और सूजन में
    कुछ स्थानों पर इसका उपयोग प्रसव को आसान बनाने में भी किया जाता है
    बदलते समय में खोती पहचान

    आज के आधुनिक दौर में, जहां बच्चे मोबाइल और स्क्रीन में व्यस्त हैं, वहीं “बंदर की रोटी” जैसे देसी फल धीरे-धीरे उनकी दुनिया से गायब होते जा रहे हैं। पहले जहां बच्चे पेड़ों पर चढ़कर इन्हें तोड़ते थे, आज कई बच्चों को इसके बारे में पता भी नहीं है।

    प्रकृति से जुड़ने की जरूरत

    यह फल सिर्फ एक स्वाद या औषधि नहीं, बल्कि हमारे बचपन, हमारी मिट्टी और हमारी परंपरा का हिस्सा है। जरूरत है कि हम नई पीढ़ी को इन प्राकृतिक धरोहरों से जोड़ें, ताकि वे भी “बंदर की रोटी” के स्वाद और उससे जुड़ी कहानियों को महसूस कर सकें।

    (मालवांचल मित्र — लोकल विरासत और यादों से जुड़ी खास रिपोर्ट)







  • सुप्रभात : “बंदर की रोटी” — बचपन की यादों से जुड़ा वो अनमोल देसी फल, जो आज भी है सेहत का खजाना

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    सुप्रभात
    सुप्रभात   - नीमच[04-04-2026]

    नीमच/मालवांचल क्षेत्र।
    गर्मी की शुरुआत होते ही पेड़ों पर लटकते कुछ अजीब से हरे फल बच्चों की उत्सुकता बढ़ा देते थे। गांव के रास्तों पर चलते हुए, खेतों के किनारे खेलते हुए या स्कूल से लौटते वक्त जैसे ही ये फल नजर आते, बचपन अपने आप लौट आता था। स्थानीय भाषा में इन्हें “बंदर की रोटी”, “बंदर पापड़ी” या “बंदर बाटी” कहा जाता है।

    यह कोई साधारण फल नहीं, बल्कि प्रकृति का अनोखा उपहार है, जिसका वैज्ञानिक नाम Holoptelea integrifolia है और अंग्रेजी में इसे Indian Elm कहा जाता है। मालवा, राजस्थान और गुजरात में इसे “चरेल” नाम से भी जाना जाता है।

    बचपन की वो मीठी यादें

    गांव के बच्चे अक्सर इन फलों को तोड़कर उनके पत्तीनुमा छिलकों को हटाते और अंदर से निकलने वाली “मींगी” (बीज का गूदा) को बड़े चाव से खाते थे। स्वाद हल्का मीठा और अलग ही होता था — जैसे कोई देसी टॉफी मिल गई हो।

    बुजुर्ग बताते हैं कि पेड़ों पर बैठे लंगूर भी इस फल को बड़े शौक से खाते हैं। खास बात यह भी कही जाती है कि मादा लंगूर प्रसव के बाद इस फल का सेवन करती हैं, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

    पूरे भारत में मिलता है यह पेड़

    यह पेड़ लगभग पूरे भारत में पाया जाता है और अलग-अलग राज्यों में इसके अलग नाम हैं — जैसे चिलबिल, सिलबिल, धाम्ना, वावली पापड़ा, निलावही आदि। जनवरी-फरवरी में इसमें फूल आते हैं और फरवरी से अप्रैल के बीच इसके फल दिखाई देते हैं।

    औषधीय गुणों से भरपूर

    जहां एक ओर यह फल बचपन की यादों से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर आयुर्वेद में इसे बेहद उपयोगी माना गया है—

    पेड़ की छाल का लेप गठिया में उपयोगी
    पत्तियों का काढ़ा मेटाबॉलिज्म सुधारने में सहायक
    पत्तियों का लेप दाद, एक्जिमा जैसे त्वचा रोगों में लाभकारी
    छाल का उपयोग आंतों के छाले और सूजन में
    कुछ स्थानों पर इसका उपयोग प्रसव को आसान बनाने में भी किया जाता है
    बदलते समय में खोती पहचान

    आज के आधुनिक दौर में, जहां बच्चे मोबाइल और स्क्रीन में व्यस्त हैं, वहीं “बंदर की रोटी” जैसे देसी फल धीरे-धीरे उनकी दुनिया से गायब होते जा रहे हैं। पहले जहां बच्चे पेड़ों पर चढ़कर इन्हें तोड़ते थे, आज कई बच्चों को इसके बारे में पता भी नहीं है।

    प्रकृति से जुड़ने की जरूरत

    यह फल सिर्फ एक स्वाद या औषधि नहीं, बल्कि हमारे बचपन, हमारी मिट्टी और हमारी परंपरा का हिस्सा है। जरूरत है कि हम नई पीढ़ी को इन प्राकृतिक धरोहरों से जोड़ें, ताकि वे भी “बंदर की रोटी” के स्वाद और उससे जुड़ी कहानियों को महसूस कर सकें।

    (मालवांचल मित्र — लोकल विरासत और यादों से जुड़ी खास रिपोर्ट)





  • Today in History: विश्व रेडियो दिवस

    Today in History:
  • Today in History: विश्व रेडियो दिवस

     विश्व रेडियो दिवस
  • प्रेरणादायक कहानी : पंच परमेश्वर

    प्रेरणादायक कहानी :
  • प्रेरणादायक कहानी : पंच परमेश्वर

     पंच परमेश्वर
  • प्रेरणादायक कहानी: प्रेरणादायक कहानी:

    प्रेरणादायक कहानी:
  • प्रेरणादायक कहानी: प्रेरणादायक कहानी:

    प्रेरणादायक कहानी: