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मालवांचल मित्र, व्यापार विशेष: भारत में ऑनलाइन फूड डिलीवरी का बाजार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। सुविधा, विकल्पों की भरमार और समय की बचत ने इसे शहरी जीवनशैली का अहम हिस्सा बना दिया है। लेकिन अब यही सुविधा धीरे-धीरे महंगी होती जा रही है। हाल ही में Zomato द्वारा प्लेटफॉर्म फीस में बढ़ोतरी ने एक बार फिर इस मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। बढ़ती फीस: छोटे-छोटे चार्ज का बड़ा असर Zomato ने अपनी प्लेटफॉर्म फीस में प्रति ऑर्डर 2.40 रुपये का इजाफा किया है। पहले जहां यह शुल्क GST लागू होने से पहले 12.50 रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 14.90 रुपये प्रति ऑर्डर हो गया है। देखने में यह बढ़ोतरी मामूली लग सकती है, लेकिन जब इसे डिलीवरी चार्ज, पैकेजिंग फीस और टैक्स जैसे अन्य शुल्कों के साथ जोड़ा जाता है, तो कुल बिल पर इसका असर साफ नजर आता है। यह पहली बार नहीं है जब कंपनी ने फीस बढ़ाई हो। सितंबर 2025 में भी इसी तरह की वृद्धि की गई थी, जो दर्शाता है कि यह एक लगातार चलने वाला ट्रेंड बन चुका है। प्रतिस्पर्धा में समान रणनीति Zomato की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी Swiggy भी फिलहाल प्रति ऑर्डर 14.99 रुपये प्लेटफॉर्म फीस वसूल रही है, जिसमें टैक्स शामिल है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों कंपनियां अक्सर एक-दूसरे की रणनीति को देखते हुए अपने शुल्क तय करती हैं। इससे बाजार में एक तरह का संतुलन बना रहता है, लेकिन उपभोक्ताओं के पास सस्ते विकल्प सीमित हो जाते हैं। उपभोक्ताओं की बढ़ती चिंता ग्राहकों ने पिछले कुछ समय में फूड डिलीवरी ऐप्स पर बढ़ते चार्जेज को लेकर लगातार चिंता जताई है। एक साधारण ऑर्डर पर भी कई तरह की फीस जुड़ जाती है—डिलीवरी फीस, प्लेटफॉर्म फीस, रेस्टोरेंट चार्ज, टैक्स—जिससे कुल कीमत रेस्टोरेंट में जाकर खाने से कहीं अधिक हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां अपने मुनाफे को स्थिर रखने और लॉजिस्टिक्स लागत को कवर करने के लिए इन फीस में वृद्धि कर रही हैं। लेकिन इसका सीधा असर ग्राहक के बजट पर पड़ रहा है। नए खिलाड़ी से बढ़ेगी टक्कर? इसी बीच, Rapido ने बेंगलुरु में अपनी नई फूड डिलीवरी सेवा ‘Only’ लॉन्च की है। कंपनी का दावा है कि वह डिलीवरी चार्ज के अलावा ग्राहकों या रेस्टोरेंट से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लेगी। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो यह मौजूदा दिग्गज कंपनियों के लिए चुनौती बन सकता है। Rapido का यह कदम ऐसे समय में आया है जब ग्राहक पारदर्शिता और कम कीमत की मांग कर रहे हैं। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और संभवतः शुल्क संरचना में बदलाव आने की उम्मीद की जा सकती है। आगे क्या? फूड डिलीवरी सेक्टर अब एक परिपक्व बाजार बन चुका है, जहां कंपनियां लाभ कमाने के लिए नए-नए तरीके अपना रही हैं। लेकिन लगातार बढ़ती फीस से ग्राहक असंतुष्ट हो सकते हैं और वैकल्पिक विकल्पों की तलाश कर सकते हैं—जैसे सीधे रेस्टोरेंट से ऑर्डर करना या बाहर जाकर खाना। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नई कंपनियों का दबाव और ग्राहकों की नाराजगी इन दिग्गज प्लेटफॉर्म्स को अपनी शुल्क नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगी या फिर यह बढ़ोतरी आगे भी जारी रहेगी। निष्कर्ष: |
मालवांचल मित्र, व्यापार विशेष: भारत में ऑनलाइन फूड डिलीवरी का बाजार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। सुविधा, विकल्पों की भरमार और समय की बचत ने इसे शहरी जीवनशैली का अहम हिस्सा बना दिया है। लेकिन अब यही सुविधा धीरे-धीरे महंगी होती जा रही है। हाल ही में Zomato द्वारा प्लेटफॉर्म फीस में बढ़ोतरी ने एक बार फिर इस मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
बढ़ती फीस: छोटे-छोटे चार्ज का बड़ा असर
Zomato ने अपनी प्लेटफॉर्म फीस में प्रति ऑर्डर 2.40 रुपये का इजाफा किया है। पहले जहां यह शुल्क GST लागू होने से पहले 12.50 रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 14.90 रुपये प्रति ऑर्डर हो गया है। देखने में यह बढ़ोतरी मामूली लग सकती है, लेकिन जब इसे डिलीवरी चार्ज, पैकेजिंग फीस और टैक्स जैसे अन्य शुल्कों के साथ जोड़ा जाता है, तो कुल बिल पर इसका असर साफ नजर आता है।
यह पहली बार नहीं है जब कंपनी ने फीस बढ़ाई हो। सितंबर 2025 में भी इसी तरह की वृद्धि की गई थी, जो दर्शाता है कि यह एक लगातार चलने वाला ट्रेंड बन चुका है।
प्रतिस्पर्धा में समान रणनीति
Zomato की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी Swiggy भी फिलहाल प्रति ऑर्डर 14.99 रुपये प्लेटफॉर्म फीस वसूल रही है, जिसमें टैक्स शामिल है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों कंपनियां अक्सर एक-दूसरे की रणनीति को देखते हुए अपने शुल्क तय करती हैं। इससे बाजार में एक तरह का संतुलन बना रहता है, लेकिन उपभोक्ताओं के पास सस्ते विकल्प सीमित हो जाते हैं।
उपभोक्ताओं की बढ़ती चिंता
ग्राहकों ने पिछले कुछ समय में फूड डिलीवरी ऐप्स पर बढ़ते चार्जेज को लेकर लगातार चिंता जताई है। एक साधारण ऑर्डर पर भी कई तरह की फीस जुड़ जाती है—डिलीवरी फीस, प्लेटफॉर्म फीस, रेस्टोरेंट चार्ज, टैक्स—जिससे कुल कीमत रेस्टोरेंट में जाकर खाने से कहीं अधिक हो जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां अपने मुनाफे को स्थिर रखने और लॉजिस्टिक्स लागत को कवर करने के लिए इन फीस में वृद्धि कर रही हैं। लेकिन इसका सीधा असर ग्राहक के बजट पर पड़ रहा है।
नए खिलाड़ी से बढ़ेगी टक्कर?
इसी बीच, Rapido ने बेंगलुरु में अपनी नई फूड डिलीवरी सेवा ‘Only’ लॉन्च की है। कंपनी का दावा है कि वह डिलीवरी चार्ज के अलावा ग्राहकों या रेस्टोरेंट से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लेगी। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो यह मौजूदा दिग्गज कंपनियों के लिए चुनौती बन सकता है।
Rapido का यह कदम ऐसे समय में आया है जब ग्राहक पारदर्शिता और कम कीमत की मांग कर रहे हैं। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और संभवतः शुल्क संरचना में बदलाव आने की उम्मीद की जा सकती है।
आगे क्या?
फूड डिलीवरी सेक्टर अब एक परिपक्व बाजार बन चुका है, जहां कंपनियां लाभ कमाने के लिए नए-नए तरीके अपना रही हैं। लेकिन लगातार बढ़ती फीस से ग्राहक असंतुष्ट हो सकते हैं और वैकल्पिक विकल्पों की तलाश कर सकते हैं—जैसे सीधे रेस्टोरेंट से ऑर्डर करना या बाहर जाकर खाना।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नई कंपनियों का दबाव और ग्राहकों की नाराजगी इन दिग्गज प्लेटफॉर्म्स को अपनी शुल्क नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगी या फिर यह बढ़ोतरी आगे भी जारी रहेगी।
निष्कर्ष:
सुविधा की कीमत चुकानी पड़ती है—यह कहावत फूड डिलीवरी ऐप्स पर पूरी तरह लागू होती दिख रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उपभोक्ता इस बढ़ती कीमत को लंबे समय तक स्वीकार करेंगे, या बाजार में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा?