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मालवांचल मित्र, गोवा: भारतीय देव परंपरा में शांतादुर्गा देवी दुर्गा का एक अत्यंत पूजनीय और लोकप्रिय स्वरूप है। विशेष रूप से गोवा और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में उनकी गहरी श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है। शांतादुर्गा को प्राचीन मातृदेवी सांतरी का ही रूप माना जाता है। गोवा और महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग क्षेत्र के अनेक गांवों में आज भी देवी की पूजा दीमक के टीले (एंथिल) के रूप में की जाती है। यह परंपरा देवी की लोक आस्था और प्रकृति से जुड़े स्वरूप को दर्शाती है। शांतादुर्गा को समर्पित कई मंदिरों में यह परंपरा आज भी जीवित है। शास्त्रीय उल्लेख और नाम की उत्पत्ति संस्कृत ग्रंथ नागव्य महात्म्य के दूसरे अध्याय “शांतादुर्गा प्रादुर्भाव” (जो सह्याद्रिखंड, स्कंद पुराण का भाग है) में देवी के प्राकट्य का वर्णन मिलता है। इस वर्णन के अनुसार नागव्य (वर्तमान नागोआ) में रहने वाले ऋषि शांतामुनि के सामने देवी प्रकट हुईं। इसी कारण उनका नाम शांतादुर्गा पड़ा। हालांकि दुर्गा को अनेक स्थानों पर उग्र रूप में दर्शाया जाता है, फिर भी “शांत” विशेषण उनके कई नामावलियों में मिलता है। सह्याद्रिखंड के कुछ श्लोकों में देवी को शांतादेवी भी कहा गया है। एक श्लोक में देवी के दीमक के टीले में विलीन होने का उल्लेख मिलता है, जो आज भी उनकी पूजा परंपरा से जुड़ा प्रतीक माना जाता है। शिव और विष्णु के बीच शांति स्थापित करने वाली देवी लोकमान्यता के अनुसार एक समय भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया था। इस संघर्ष से पूरा विश्व अशांत हो उठा। तब भगवान ब्रह्मा ने आदिशक्ति से हस्तक्षेप करने की प्रार्थना की। देवी ने एक हाथ से शिव और दूसरे हाथ से विष्णु को थामकर दोनों में सुलह करा दी। इस प्रकार युद्ध समाप्त हुआ और संसार में शांति स्थापित हुई। इसी घटना के कारण देवी का यह रूप शांतादुर्गा कहलाया—अर्थात वह शक्ति जो संघर्ष को शांति में बदल दे। कावले मंदिर की विशेष महिमा गोवा के कावले स्थित प्रसिद्ध शांतादुर्गा मंदिर में देवी का यह अद्वितीय स्वरूप देखने को मिलता है। यहाँ गर्भगृह में स्थापित धातु प्रतिमा चार भुजाओं वाली है:
यह प्रतिमा देवी के “समन्वय कराने वाले” दिव्य स्वरूप का प्रतीक मानी जाती है। 17वीं शताब्दी के मराठी ग्रंथ कोंकण महात्म्य में गोवा में वैष्णव और शैव संप्रदायों के बीच संघर्ष का वर्णन मिलता है। विद्वानों का मानना है कि शांतादुर्गा की यह कथा संभवतः उसी ऐतिहासिक तनाव का प्रतीकात्मक रूप है। मंदिरों में देवी के विविध रूप शांतादुर्गा की पूजा अलग-अलग रूपों में की जाती है: प्रतिमा रूप अधिकांश मंदिरों में देवी की चार भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित होती है। उनके हाथों में प्रायः ये आयुध दिखाई देते हैं:
कई प्रतिमाओं में देवी अभय मुद्रा और वरद मुद्रा में भी विराजमान होती हैं। दीमक के टीले के रूप में पूजा गोवा और सिंधुदुर्ग के कई स्थानों पर देवी की पूजा दीमक के टीले के रूप में की जाती है, जो उनकी प्राचीन लोकपरंपरा को दर्शाता है। कलश रूप कुछ दुर्लभ मंदिरों—विशेषकर मार्सेला (गोवा) के शांतादुर्गा कुंभर्जुवेकरिन मंदिर—में देवी के प्रतीक रूप में कलश की पूजा भी होती है। शिव पूजा का विशेष महत्व शांतादुर्गा देवी को भगवान शिव की पत्नी और उनकी परम भक्त दोनों माना जाता है। इसी कारण उनकी पूजा के साथ शिव की पूजा भी अनिवार्य मानी जाती है। अनेक मंदिरों के गर्भगृह में देवी की मूर्ति के पास काले पत्थर का छोटा शिवलिंग स्थापित रहता है। अभिषेक के समय देवी और शिव दोनों की संयुक्त पूजा की जाती है। मूर्ति का ऐतिहासिक प्रसंग इतिहास के अनुसार सन् 1898 में मंदिर से देवी की मूल मूर्ति चोरी हो गई थी। इसके बाद 1901 में शिल्पकार श्री लक्ष्मण कृष्णाजी गायतोंडे ने नई प्रतिमा बनाई। इस नई मूर्ति की विधिवत स्थापना बुधवार, फाल्गुन शुक्ल दशमी, शक 1823 (19 मार्च 1902) को की गई। यही प्रतिमा आज तक मंदिर में विराजमान है। नई मूर्ति स्थापित होने तक पूजा कावले मठ के श्री गौडपादाचार्य द्वारा श्री भवानीशंकर की मूर्ति के साथ की जाती रही। बाद में पुरानी मूर्ति को वर्तमान प्रतिमा के पीछे कपाट-मंदिर में स्थापित कर दिया गया, जहाँ आज भी उसकी दैनिक पूजा होती है। शिवलिंग का पुनःस्थापन लगातार अभिषेक और पूजा के कारण देवी के पास रखा शिवलिंग समय के साथ घिसने लगा था। देवी से अनुमति (प्रसाद कौल) प्राप्त करने के बाद मुंबई के शिल्पकार श्री रामचंद्र सुंदर को नया शिवलिंग बनाने का कार्य सौंपा गया। नया शिवलिंग मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी, 27 नवंबर 1965 को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्थापित किया गया। पुराने शिवलिंग का धार्मिक विधि से समुद्र में विसर्जन कर दिया गया। आध्यात्मिक संदेश शांतादुर्गा देवी केवल शक्ति की प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे संतुलन, शांति और समरसता का दिव्य संदेश देती हैं। उनका स्वरूप हमें सिखाता है कि:
शांतादुर्गा से विशेष आस्था गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के अनेक कुलों की कुलदेवी (Kuladevata) शांतादुर्गा मानी जाती हैं। विशेष रूप से गोवा के कावले स्थित शांतादुर्गा मंदिर इस समुदाय की प्रमुख आस्था का केंद्र है। इस समुदाय की मान्यता के अनुसार:
कावले मठ और धार्मिक परंपरा शांतादुर्गा मंदिर की पूजा-पद्धति और धार्मिक व्यवस्थाओं में गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों का ऐतिहासिक योगदान रहा है। कावले मठ (कवले मठ) इस परंपरा का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। यहाँ:
सांस्कृतिक पहचान गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के लिए शांतादुर्गा केवल एक देवी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक आस्था का केंद्र हैं। गोवा से विस्थापन (विशेषकर पुर्तगाली काल में) के दौरान भी इस समुदाय ने अपनी कुलदेवी की पूजा परंपरा को जीवित रखा और जहाँ-जहाँ वे बसे, वहाँ शांतादुर्गा के मंदिर स्थापित किए। निष्कर्ष शांतादुर्गा देवी की महिमा और गौड़ सारस्वत ब्राह्मण समुदाय की परंपरा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह संबंध केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक आस्था का प्रतीक है। आज भी लाखों गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार अपनी कुलदेवी शांतादुर्गा की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। |
मालवांचल मित्र, गोवा: भारतीय देव परंपरा में शांतादुर्गा देवी दुर्गा का एक अत्यंत पूजनीय और लोकप्रिय स्वरूप है। विशेष रूप से गोवा और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में उनकी गहरी श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है। शांतादुर्गा को प्राचीन मातृदेवी सांतरी का ही रूप माना जाता है।
गोवा और महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग क्षेत्र के अनेक गांवों में आज भी देवी की पूजा दीमक के टीले (एंथिल) के रूप में की जाती है। यह परंपरा देवी की लोक आस्था और प्रकृति से जुड़े स्वरूप को दर्शाती है। शांतादुर्गा को समर्पित कई मंदिरों में यह परंपरा आज भी जीवित है।
शास्त्रीय उल्लेख और नाम की उत्पत्ति
संस्कृत ग्रंथ नागव्य महात्म्य के दूसरे अध्याय “शांतादुर्गा प्रादुर्भाव” (जो सह्याद्रिखंड, स्कंद पुराण का भाग है) में देवी के प्राकट्य का वर्णन मिलता है।
इस वर्णन के अनुसार नागव्य (वर्तमान नागोआ) में रहने वाले ऋषि शांतामुनि के सामने देवी प्रकट हुईं। इसी कारण उनका नाम शांतादुर्गा पड़ा।
हालांकि दुर्गा को अनेक स्थानों पर उग्र रूप में दर्शाया जाता है, फिर भी “शांत” विशेषण उनके कई नामावलियों में मिलता है। सह्याद्रिखंड के कुछ श्लोकों में देवी को शांतादेवी भी कहा गया है। एक श्लोक में देवी के दीमक के टीले में विलीन होने का उल्लेख मिलता है, जो आज भी उनकी पूजा परंपरा से जुड़ा प्रतीक माना जाता है।
शिव और विष्णु के बीच शांति स्थापित करने वाली देवी
लोकमान्यता के अनुसार एक समय भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया था। इस संघर्ष से पूरा विश्व अशांत हो उठा।
तब भगवान ब्रह्मा ने आदिशक्ति से हस्तक्षेप करने की प्रार्थना की। देवी ने एक हाथ से शिव और दूसरे हाथ से विष्णु को थामकर दोनों में सुलह करा दी। इस प्रकार युद्ध समाप्त हुआ और संसार में शांति स्थापित हुई।
इसी घटना के कारण देवी का यह रूप शांतादुर्गा कहलाया—अर्थात वह शक्ति जो संघर्ष को शांति में बदल दे।
कावले मंदिर की विशेष महिमा
गोवा के कावले स्थित प्रसिद्ध शांतादुर्गा मंदिर में देवी का यह अद्वितीय स्वरूप देखने को मिलता है। यहाँ गर्भगृह में स्थापित धातु प्रतिमा चार भुजाओं वाली है:
निचले हाथों में शिव और विष्णु के छोटे रूप
ऊपरी हाथों में नाग
यह प्रतिमा देवी के “समन्वय कराने वाले” दिव्य स्वरूप का प्रतीक मानी जाती है।
17वीं शताब्दी के मराठी ग्रंथ कोंकण महात्म्य में गोवा में वैष्णव और शैव संप्रदायों के बीच संघर्ष का वर्णन मिलता है। विद्वानों का मानना है कि शांतादुर्गा की यह कथा संभवतः उसी ऐतिहासिक तनाव का प्रतीकात्मक रूप है।
मंदिरों में देवी के विविध रूप
शांतादुर्गा की पूजा अलग-अलग रूपों में की जाती है:
प्रतिमा रूप
अधिकांश मंदिरों में देवी की चार भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित होती है। उनके हाथों में प्रायः ये आयुध दिखाई देते हैं:
खड्ग (तलवार)
पानपात्र (अमृत पात्र)
खेटक (ढाल)
त्रिशूल
डमरू
पद्म (कमल)
नाग
कई प्रतिमाओं में देवी अभय मुद्रा और वरद मुद्रा में भी विराजमान होती हैं।
दीमक के टीले के रूप में पूजा
गोवा और सिंधुदुर्ग के कई स्थानों पर देवी की पूजा दीमक के टीले के रूप में की जाती है, जो उनकी प्राचीन लोकपरंपरा को दर्शाता है।
कलश रूप
कुछ दुर्लभ मंदिरों—विशेषकर मार्सेला (गोवा) के शांतादुर्गा कुंभर्जुवेकरिन मंदिर—में देवी के प्रतीक रूप में कलश की पूजा भी होती है।
शिव पूजा का विशेष महत्व
शांतादुर्गा देवी को भगवान शिव की पत्नी और उनकी परम भक्त दोनों माना जाता है। इसी कारण उनकी पूजा के साथ शिव की पूजा भी अनिवार्य मानी जाती है।
अनेक मंदिरों के गर्भगृह में देवी की मूर्ति के पास काले पत्थर का छोटा शिवलिंग स्थापित रहता है। अभिषेक के समय देवी और शिव दोनों की संयुक्त पूजा की जाती है।
मूर्ति का ऐतिहासिक प्रसंग
इतिहास के अनुसार सन् 1898 में मंदिर से देवी की मूल मूर्ति चोरी हो गई थी। इसके बाद 1901 में शिल्पकार श्री लक्ष्मण कृष्णाजी गायतोंडे ने नई प्रतिमा बनाई।
इस नई मूर्ति की विधिवत स्थापना बुधवार, फाल्गुन शुक्ल दशमी, शक 1823 (19 मार्च 1902) को की गई। यही प्रतिमा आज तक मंदिर में विराजमान है।
नई मूर्ति स्थापित होने तक पूजा कावले मठ के श्री गौडपादाचार्य द्वारा श्री भवानीशंकर की मूर्ति के साथ की जाती रही। बाद में पुरानी मूर्ति को वर्तमान प्रतिमा के पीछे कपाट-मंदिर में स्थापित कर दिया गया, जहाँ आज भी उसकी दैनिक पूजा होती है।
शिवलिंग का पुनःस्थापन
लगातार अभिषेक और पूजा के कारण देवी के पास रखा शिवलिंग समय के साथ घिसने लगा था। देवी से अनुमति (प्रसाद कौल) प्राप्त करने के बाद मुंबई के शिल्पकार श्री रामचंद्र सुंदर को नया शिवलिंग बनाने का कार्य सौंपा गया।
नया शिवलिंग मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी, 27 नवंबर 1965 को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्थापित किया गया। पुराने शिवलिंग का धार्मिक विधि से समुद्र में विसर्जन कर दिया गया।
आध्यात्मिक संदेश
शांतादुर्गा देवी केवल शक्ति की प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे संतुलन, शांति और समरसता का दिव्य संदेश देती हैं। उनका स्वरूप हमें सिखाता है कि:
संघर्ष का समाधान संवाद से होता है
शक्ति का सर्वोच्च रूप शांति है
और धर्म का मार्ग संतुलन में है
शांतादुर्गा से विशेष आस्था
गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के अनेक कुलों की कुलदेवी (Kuladevata) शांतादुर्गा मानी जाती हैं। विशेष रूप से गोवा के कावले स्थित शांतादुर्गा मंदिर इस समुदाय की प्रमुख आस्था का केंद्र है।
इस समुदाय की मान्यता के अनुसार:
शांतादुर्गा परिवार की रक्षक देवी हैं
विवाह, नामकरण और अन्य संस्कारों में देवी का स्मरण किया जाता है
कुलपुरोहित परंपरा में देवी की विशेष पूजा होती है
कावले मठ और धार्मिक परंपरा
शांतादुर्गा मंदिर की पूजा-पद्धति और धार्मिक व्यवस्थाओं में गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों का ऐतिहासिक योगदान रहा है। कावले मठ (कवले मठ) इस परंपरा का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।
यहाँ:
वैदिक विधि से नित्य पूजा होती है
उत्सव और जत्राएँ पारंपरिक रीति से मनाई जाती हैं
समुदाय के धार्मिक निर्णयों में मठ की भूमिका रहती है
सांस्कृतिक पहचान
गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के लिए शांतादुर्गा केवल एक देवी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक आस्था का केंद्र हैं।
गोवा से विस्थापन (विशेषकर पुर्तगाली काल में) के दौरान भी इस समुदाय ने अपनी कुलदेवी की पूजा परंपरा को जीवित रखा और जहाँ-जहाँ वे बसे, वहाँ शांतादुर्गा के मंदिर स्थापित किए।
निष्कर्ष
शांतादुर्गा देवी की महिमा और गौड़ सारस्वत ब्राह्मण समुदाय की परंपरा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह संबंध केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक आस्था का प्रतीक है।
आज भी लाखों गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार अपनी कुलदेवी शांतादुर्गा की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।