• संपादकीय : अंधा बाँटे रेवड़ी... नीमच में सरकारी जमीन, गुमटियों और आंदोलन की राजनीति पर सवाल

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[25-08-2026]
  • सम्पादकीय | मालवांचल मित्र

     

    नीमच में सरकारी जमीन और अतिक्रमण का मुद्दा अब सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि व्यवस्था की पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का सवाल बनता जा रहा है।

    ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे’—यह कहावत भले ही पुरानी हो, लेकिन नीमच की राजनीति और नगर व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच यह कहावत आज भी बड़ी सटीक बैठती नजर आती है।

    नीमच नगर में गुमटियों और सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कोई आज की पैदा हुई समस्या नहीं है। सत्ता बदलती रही, चेहरे बदलते रहे, लेकिन सरकारी जमीन, गुमटियों और अतिक्रमण को लेकर सवाल अपनी जगह बने रहे। फर्क सिर्फ इतना रहा कि जिस समय जिसकी सत्ता रही, उस समय उसके आसपास के लोगों पर ‘कृपा’ की चर्चा ज्यादा सुनाई दी।

    अब मामला एक सरकारी स्कूल की जमीन का सामने आया तो अचानक सरकारी जमीन के कागज, विभागीय अधिकार और जमीन की मिल्कियत पर बहस तेज हो गई। मैदान को लेकर आवाज उठाने वालों को यह समझाने की कोशिश होने लगी कि जमीन स्कूल शिक्षा विभाग की है। सवाल यह नहीं है कि जमीन किस विभाग की है। असली सवाल यह है कि सरकारी जमीन का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी है?

    अगर सरकारी जमीन पर कब्जा गलत है तो कार्रवाई हर जगह समान होनी चाहिए। स्कूल की जमीन हो, नगरपालिका की जमीन हो या किसी अन्य सरकारी विभाग की—कानून का पैमाना एक होना चाहिए।

     

    कार्रवाई सिर्फ चुनिंदा मामलों में क्यों?

    नीमच में गुमटियों और अतिक्रमण का मुद्दा नया नहीं है। शहर के लोगों के बीच अक्सर यह चर्चा रहती है कि कुछ मामलों में प्रशासन का बुलडोजर बहुत तेज चलता है और कुछ मामलों में उसकी रफ्तार अचानक सरकारी फाइल जैसी हो जाती है।

    ऐसे में सवाल कलेक्टर से ज्यादा पूरी व्यवस्था से है।

    अगर प्रशासन वास्तव में पारदर्शिता चाहता है तो सरकार और नगर पालिका परिषद को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। उसमें साफ-साफ बताया जाए कि अलग-अलग कार्यकाल में कौन सी सरकारी भूमि किस संस्था, व्यक्ति या समूह को किस आधार पर आवंटित की गई। किन मामलों में लीज हुई, किन मामलों में अनुमति मिली और किन मामलों में अतिक्रमण हुआ।

    इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

    पारदर्शिता लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत होती है।

    आंदोलन करने वाला ‘आंदोलनजीवी’ कैसे हो गया?

    लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखने के लिए आंदोलन करना जनता का अधिकार है। लेकिन आजकल आंदोलन करने वालों को ही ‘आंदोलनजीवी’ कहकर खारिज करने का चलन बढ़ता दिखाई देता है।

    जरा इतिहास के पन्ने पलटिए।

    क्या मोदी युग से पहले देश में आंदोलन नहीं हुए?

    क्या आपातकाल के खिलाफ हुए आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा नहीं बदली?

    क्या उसी दौर की राजनीतिक हलचलों से जनता पार्टी का जन्म नहीं हुआ?

    क्या मनमोहन सिंह सरकार के समय अन्ना आंदोलन का राजनीतिक असर नहीं हुआ और उसका लाभ भाजपा को नहीं मिला?

    फिर आज अगर कोई नागरिक अपने शहर, मैदान, जमीन या सार्वजनिक हित के मुद्दे पर सवाल उठाता है तो उसे आंदोलनजीवी कहकर उसकी बात खत्म कर देना कितना लोकतांत्रिक है?

    सवाल करने वाला हमेशा गलत नहीं होता और सत्ता में बैठा व्यक्ति हमेशा सही हो, ऐसा लोकतंत्र का कोई नियम नहीं है।

     

    कलेक्टर के कंधे पर बंदूक रखकर समस्या हल होगी?

    नीमच जिले का मतदाता बहुत कुछ देख रहा है। जनता यह भी देखती है कि कौन मुद्दे पर सामने आता है और कौन प्रशासनिक अधिकारियों के पीछे खड़े होकर राजनीति करता है।

    यदि हर विवाद में कलेक्टर के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिक निशाना साधना ही रणनीति है तो फिर एक बड़ा सवाल बनता है—क्या चुनाव भी कलेक्टर की अगुवाई में लड़े जाएंगे?

    प्रशासन का काम कानून लागू करना है। राजनीतिक निर्णय राजनीतिक नेतृत्व को लेने चाहिए। दोनों के बीच की सीमा जितनी स्पष्ट रहेगी, लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ रहेगा।

    जमीन जिसके पास, क्या वही मालिक?

    गुमटियों और सरकारी जमीन के मामलों में एक बुनियादी सवाल बार-बार सामने आता है—क्या जमीन पर कब्जा कर लेने मात्र से कोई उसका मालिक हो जाता है?

    अगर नहीं, तो फिर वर्षों से चले आ रहे ऐसे मामलों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?

    और अगर किसी को वैधानिक अनुमति मिली है तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?

    यही वह जगह है जहां व्यवस्था को जवाब देना चाहिए।

    कोर्ट के स्थगन के बाद क्या हुआ?

    जमीनों पर कार्रवाई से जुड़े मामलों में न्यायालय के स्थगन आदेश के बाद प्रशासन ने क्या कदम उठाए? किन मामलों में कार्रवाई रुकी? किन मामलों में प्रक्रिया आगे बढ़ी? कौन से प्रकरण न्यायालय में लंबित हैं और किन मामलों में प्रशासन ने अपना पक्ष मजबूती से रखा?

    इन सवालों के जवाब भी सार्वजनिक होने चाहिए।

    क्योंकि जनता को सिर्फ कार्रवाई की तस्वीर नहीं चाहिए, उसे पूरी कहानी जानने का अधिकार है।

     

    जिला योजना समिति में क्या चर्चा होती है?

    एक और सवाल जिला योजना समिति की बैठकों को लेकर है।

    क्या सरकारी जमीन, सार्वजनिक मैदान, गरीबों के आवास, अतिक्रमण और नगर विकास जैसे विषय वहां पर्याप्त गंभीरता से उठते हैं? अगर उठते हैं तो उन पर क्या निर्णय हुए? और अगर नहीं उठते तो क्यों?

    बैठकें सिर्फ प्रस्ताव और औपचारिकताओं के लिए नहीं होतीं। उनका उद्देश्य जिले की वास्तविक समस्याओं पर नीति और दिशा तय करना भी है।

    गरीबों के लिए स्वीकृत कॉलोनियों का क्या हुआ?

    नगरपालिका परिषद में गरीबों के लिए दो कॉलोनियों के प्रस्ताव स्वीकृत होने की बात सामने आई थी। अब जनता जानना चाहती है कि उन प्रस्तावों का आगे क्या हुआ?

    फाइल कहां पहुंची?

    जमीन कहां है?

    निर्माण कब होगा?

    लाभार्थियों को कब राहत मिलेगी?

    गरीब के लिए आवास की योजना फाइलों में घूमती रहे और दूसरी तरफ जमीनों को लेकर विवाद चलता रहे तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

    चापलूसी से व्यवस्था नहीं चलती

    सत्ता के आसपास चापलूस हमेशा रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उनका काम होता है—हर निर्णय में ‘बहुत अच्छा’ कहना।

    लेकिन अच्छे शासन को ‘बहुत अच्छा’ कहने वाले लोगों से ज्यादा उन लोगों की जरूरत होती है जो समय रहते कह सकें—साहब, यहां गलती हो सकती है।

    निर्णय क्षमता वाले व्यक्ति के आसपास ऐसे साथी होने चाहिए जो धारा के साथ बहने के बजाय जरूरत पड़ने पर धारा के विपरीत जाने की सलाह भी दे सकें।

    क्योंकि चापलूस किरदार तत्काल तालियां तो बजवा सकते हैं, लेकिन गलत निर्णय का परिणाम आने पर वही तालियां कटघरे में बदल जाती हैं।

    नीमच का सवाल किसी एक व्यक्ति, दल या संस्था का नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी जमीन सरकारी रहे, सार्वजनिक मैदान सार्वजनिक रहें, गरीबों के लिए बनी योजनाएं जमीन पर उतरें और कानून सबके लिए बराबर हो।

    जनता को पक्ष नहीं चाहिए, पारदर्शिता चाहिए।

    आंदोलन करने वालों को उपदेश नहीं, जवाब चाहिए।

    और प्रशासन से अपेक्षा सिर्फ कार्रवाई की नहीं, निष्पक्ष कार्रवाई की है।

    आखिर लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट देने के दिन जागती है—ऐसा मान लेना शायद सबसे बड़ी भूल होगी।



  • संपादकीय : अंधा बाँटे रेवड़ी... नीमच में सरकारी जमीन, गुमटियों और आंदोलन की राजनीति पर सवाल

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[25-08-2026]

    सम्पादकीय | मालवांचल मित्र

     

    नीमच में सरकारी जमीन और अतिक्रमण का मुद्दा अब सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि व्यवस्था की पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का सवाल बनता जा रहा है।

    ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे’—यह कहावत भले ही पुरानी हो, लेकिन नीमच की राजनीति और नगर व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच यह कहावत आज भी बड़ी सटीक बैठती नजर आती है।

    नीमच नगर में गुमटियों और सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कोई आज की पैदा हुई समस्या नहीं है। सत्ता बदलती रही, चेहरे बदलते रहे, लेकिन सरकारी जमीन, गुमटियों और अतिक्रमण को लेकर सवाल अपनी जगह बने रहे। फर्क सिर्फ इतना रहा कि जिस समय जिसकी सत्ता रही, उस समय उसके आसपास के लोगों पर ‘कृपा’ की चर्चा ज्यादा सुनाई दी।

    अब मामला एक सरकारी स्कूल की जमीन का सामने आया तो अचानक सरकारी जमीन के कागज, विभागीय अधिकार और जमीन की मिल्कियत पर बहस तेज हो गई। मैदान को लेकर आवाज उठाने वालों को यह समझाने की कोशिश होने लगी कि जमीन स्कूल शिक्षा विभाग की है। सवाल यह नहीं है कि जमीन किस विभाग की है। असली सवाल यह है कि सरकारी जमीन का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी है?

    अगर सरकारी जमीन पर कब्जा गलत है तो कार्रवाई हर जगह समान होनी चाहिए। स्कूल की जमीन हो, नगरपालिका की जमीन हो या किसी अन्य सरकारी विभाग की—कानून का पैमाना एक होना चाहिए।

     

    कार्रवाई सिर्फ चुनिंदा मामलों में क्यों?

    नीमच में गुमटियों और अतिक्रमण का मुद्दा नया नहीं है। शहर के लोगों के बीच अक्सर यह चर्चा रहती है कि कुछ मामलों में प्रशासन का बुलडोजर बहुत तेज चलता है और कुछ मामलों में उसकी रफ्तार अचानक सरकारी फाइल जैसी हो जाती है।

    ऐसे में सवाल कलेक्टर से ज्यादा पूरी व्यवस्था से है।

    अगर प्रशासन वास्तव में पारदर्शिता चाहता है तो सरकार और नगर पालिका परिषद को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। उसमें साफ-साफ बताया जाए कि अलग-अलग कार्यकाल में कौन सी सरकारी भूमि किस संस्था, व्यक्ति या समूह को किस आधार पर आवंटित की गई। किन मामलों में लीज हुई, किन मामलों में अनुमति मिली और किन मामलों में अतिक्रमण हुआ।

    इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

    पारदर्शिता लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत होती है।

    आंदोलन करने वाला ‘आंदोलनजीवी’ कैसे हो गया?

    लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखने के लिए आंदोलन करना जनता का अधिकार है। लेकिन आजकल आंदोलन करने वालों को ही ‘आंदोलनजीवी’ कहकर खारिज करने का चलन बढ़ता दिखाई देता है।

    जरा इतिहास के पन्ने पलटिए।

    क्या मोदी युग से पहले देश में आंदोलन नहीं हुए?

    क्या आपातकाल के खिलाफ हुए आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा नहीं बदली?

    क्या उसी दौर की राजनीतिक हलचलों से जनता पार्टी का जन्म नहीं हुआ?

    क्या मनमोहन सिंह सरकार के समय अन्ना आंदोलन का राजनीतिक असर नहीं हुआ और उसका लाभ भाजपा को नहीं मिला?

    फिर आज अगर कोई नागरिक अपने शहर, मैदान, जमीन या सार्वजनिक हित के मुद्दे पर सवाल उठाता है तो उसे आंदोलनजीवी कहकर उसकी बात खत्म कर देना कितना लोकतांत्रिक है?

    सवाल करने वाला हमेशा गलत नहीं होता और सत्ता में बैठा व्यक्ति हमेशा सही हो, ऐसा लोकतंत्र का कोई नियम नहीं है।

     

    कलेक्टर के कंधे पर बंदूक रखकर समस्या हल होगी?

    नीमच जिले का मतदाता बहुत कुछ देख रहा है। जनता यह भी देखती है कि कौन मुद्दे पर सामने आता है और कौन प्रशासनिक अधिकारियों के पीछे खड़े होकर राजनीति करता है।

    यदि हर विवाद में कलेक्टर के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिक निशाना साधना ही रणनीति है तो फिर एक बड़ा सवाल बनता है—क्या चुनाव भी कलेक्टर की अगुवाई में लड़े जाएंगे?

    प्रशासन का काम कानून लागू करना है। राजनीतिक निर्णय राजनीतिक नेतृत्व को लेने चाहिए। दोनों के बीच की सीमा जितनी स्पष्ट रहेगी, लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ रहेगा।

    जमीन जिसके पास, क्या वही मालिक?

    गुमटियों और सरकारी जमीन के मामलों में एक बुनियादी सवाल बार-बार सामने आता है—क्या जमीन पर कब्जा कर लेने मात्र से कोई उसका मालिक हो जाता है?

    अगर नहीं, तो फिर वर्षों से चले आ रहे ऐसे मामलों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?

    और अगर किसी को वैधानिक अनुमति मिली है तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?

    यही वह जगह है जहां व्यवस्था को जवाब देना चाहिए।

    कोर्ट के स्थगन के बाद क्या हुआ?

    जमीनों पर कार्रवाई से जुड़े मामलों में न्यायालय के स्थगन आदेश के बाद प्रशासन ने क्या कदम उठाए? किन मामलों में कार्रवाई रुकी? किन मामलों में प्रक्रिया आगे बढ़ी? कौन से प्रकरण न्यायालय में लंबित हैं और किन मामलों में प्रशासन ने अपना पक्ष मजबूती से रखा?

    इन सवालों के जवाब भी सार्वजनिक होने चाहिए।

    क्योंकि जनता को सिर्फ कार्रवाई की तस्वीर नहीं चाहिए, उसे पूरी कहानी जानने का अधिकार है।

     

    जिला योजना समिति में क्या चर्चा होती है?

    एक और सवाल जिला योजना समिति की बैठकों को लेकर है।

    क्या सरकारी जमीन, सार्वजनिक मैदान, गरीबों के आवास, अतिक्रमण और नगर विकास जैसे विषय वहां पर्याप्त गंभीरता से उठते हैं? अगर उठते हैं तो उन पर क्या निर्णय हुए? और अगर नहीं उठते तो क्यों?

    बैठकें सिर्फ प्रस्ताव और औपचारिकताओं के लिए नहीं होतीं। उनका उद्देश्य जिले की वास्तविक समस्याओं पर नीति और दिशा तय करना भी है।

    गरीबों के लिए स्वीकृत कॉलोनियों का क्या हुआ?

    नगरपालिका परिषद में गरीबों के लिए दो कॉलोनियों के प्रस्ताव स्वीकृत होने की बात सामने आई थी। अब जनता जानना चाहती है कि उन प्रस्तावों का आगे क्या हुआ?

    फाइल कहां पहुंची?

    जमीन कहां है?

    निर्माण कब होगा?

    लाभार्थियों को कब राहत मिलेगी?

    गरीब के लिए आवास की योजना फाइलों में घूमती रहे और दूसरी तरफ जमीनों को लेकर विवाद चलता रहे तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

    चापलूसी से व्यवस्था नहीं चलती

    सत्ता के आसपास चापलूस हमेशा रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उनका काम होता है—हर निर्णय में ‘बहुत अच्छा’ कहना।

    लेकिन अच्छे शासन को ‘बहुत अच्छा’ कहने वाले लोगों से ज्यादा उन लोगों की जरूरत होती है जो समय रहते कह सकें—साहब, यहां गलती हो सकती है।

    निर्णय क्षमता वाले व्यक्ति के आसपास ऐसे साथी होने चाहिए जो धारा के साथ बहने के बजाय जरूरत पड़ने पर धारा के विपरीत जाने की सलाह भी दे सकें।

    क्योंकि चापलूस किरदार तत्काल तालियां तो बजवा सकते हैं, लेकिन गलत निर्णय का परिणाम आने पर वही तालियां कटघरे में बदल जाती हैं।

    नीमच का सवाल किसी एक व्यक्ति, दल या संस्था का नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी जमीन सरकारी रहे, सार्वजनिक मैदान सार्वजनिक रहें, गरीबों के लिए बनी योजनाएं जमीन पर उतरें और कानून सबके लिए बराबर हो।

    जनता को पक्ष नहीं चाहिए, पारदर्शिता चाहिए।

    आंदोलन करने वालों को उपदेश नहीं, जवाब चाहिए।

    और प्रशासन से अपेक्षा सिर्फ कार्रवाई की नहीं, निष्पक्ष कार्रवाई की है।

    आखिर लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट देने के दिन जागती है—ऐसा मान लेना शायद सबसे बड़ी भूल होगी।

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