• स्वास्थ : डायबिटीज़ में खाना छोड़ना क्यों है खतरनाक? जानिए लो शुगर के जोखिम और बचाव के तरीके

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    स्वास्थ
    स्वास्थ   - नीमच[03-03-2026]
  • मालवांचल मित्र, स्वस्थ विशेष: भारत को अक्सर “डायबिटीज़ कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है। Indian Council of Medical Research (ICMR) की ICMR-INDIAB 2023 स्टडी के अनुसार देश में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज़ से जूझ रहे हैं, जबकि लगभग 14 करोड़ लोग प्री-डायबिटिक स्थिति में हैं, यानी वे भविष्य में मधुमेह के उच्च जोखिम पर हैं।

    डायबिटीज़ में जहां ब्लड शुगर का बढ़ना चिंता का विषय है, वहीं शुगर का अचानक गिर जाना भी उतना ही खतरनाक हो सकता है। खासकर तब, जब मरीज दवा या इंसुलिन तो समय पर ले लेता है, लेकिन भोजन छोड़ देता है।


    डायबिटीज़ में भोजन छोड़ने का प्रभाव

    हमारा शरीर एक नियमित जैविक चक्र (बायोलॉजिकल रिद्म) पर काम करता है। तय समय पर भोजन करने से भूख से जुड़े हार्मोन सक्रिय होते हैं और शरीर ऊर्जा की अपेक्षा करता है।

    यदि कोई व्यक्ति भोजन मिस कर देता है, लेकिन दवा या इंसुलिन ले चुका है, तो ब्लड ग्लूकोज़ का स्तर तेजी से गिर सकता है। इस स्थिति को हाइपोग्लाइसीमिया (लो ब्लड शुगर) कहा जाता है।

    शरीर और विशेष रूप से मस्तिष्क को लगातार ग्लूकोज़ की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक पर्याप्त ग्लूकोज़ न मिलने पर मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, जो गंभीर परिणाम दे सकती है।


    डायबिटीज़ में भोजन का सही अंतराल

    हर व्यक्ति की उम्र, वजन, दवाइयों और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डाइट प्लान अलग हो सकता है। इसलिए व्यक्तिगत आहार योजना के लिए डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह लेना आवश्यक है।

    सामान्यतः:

    • दिन में तीन मुख्य भोजन – नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना।

    • इनके बीच 2–3 हल्के स्नैक्स।

    • स्नैक्स लगभग 100–150 कैलोरी के हो सकते हैं।

    • मुख्य भोजन 300–450 कैलोरी के आसपास हो सकता है (व्यक्ति विशेष के अनुसार बदलाव संभव है)।

    नियमित अंतराल पर भोजन करने से ब्लड शुगर संतुलित रखने में मदद मिलती है।


    लो शुगर के लक्षण: किन संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें

    हाइपोग्लाइसीमिया के लक्षण दो प्रकार के हो सकते हैं:

    1. शारीरिक (ऑटोनोमिक) संकेत

    ये शरीर की शुरुआती चेतावनी होते हैं:

    • हाथों में कंपकंपी

    • अचानक तेज भूख लगना

    • अत्यधिक पसीना

    • दिल की धड़कन तेज होना

    • घबराहट या बेचैनी

    • शरीर में झनझनाहट

    ये संकेत बताते हैं कि तुरंत कुछ खा लेना चाहिए।

    2. मस्तिष्क से जुड़े (न्यूरोग्लाइकोपेनिक) लक्षण

    ये ज्यादा गंभीर और संभावित रूप से जानलेवा हो सकते हैं:

    • चक्कर आना

    • बोलने में दिक्कत

    • भ्रम या ध्यान में कमी

    • बेहोशी

    • दौरे पड़ना

    • कोमा

    लंबे समय तक लो शुगर रहने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।


    लो शुगर से बचाव कैसे करें?

    • दवा और इंसुलिन डॉक्टर द्वारा बताए गए समय पर लें।

    • भोजन कभी न छोड़ें।

    • लंबा उपवास या अत्यधिक शारीरिक मेहनत से बचें।

    • अपने साथ हल्का स्नैक या ग्लूकोज़ टैबलेट रखें, खासकर बाहर जाते समय।

    • नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच कराते रहें।

    डायबिटीज़ का प्रबंधन केवल दवाओं से नहीं, बल्कि संतुलित आहार और नियमित जीवनशैली से भी जुड़ा है।


    महत्वपूर्ण सूचना

    यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी प्रकार की दवा, आहार या उपचार संबंधी निर्णय लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें। स्वयं दवा लेना या इलाज में बदलाव करना हानिकारक हो सकता है।



  • स्वास्थ : डायबिटीज़ में खाना छोड़ना क्यों है खतरनाक? जानिए लो शुगर के जोखिम और बचाव के तरीके

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    स्वास्थ
    स्वास्थ   - नीमच[03-03-2026]

    मालवांचल मित्र, स्वस्थ विशेष: भारत को अक्सर “डायबिटीज़ कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है। Indian Council of Medical Research (ICMR) की ICMR-INDIAB 2023 स्टडी के अनुसार देश में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज़ से जूझ रहे हैं, जबकि लगभग 14 करोड़ लोग प्री-डायबिटिक स्थिति में हैं, यानी वे भविष्य में मधुमेह के उच्च जोखिम पर हैं।

    डायबिटीज़ में जहां ब्लड शुगर का बढ़ना चिंता का विषय है, वहीं शुगर का अचानक गिर जाना भी उतना ही खतरनाक हो सकता है। खासकर तब, जब मरीज दवा या इंसुलिन तो समय पर ले लेता है, लेकिन भोजन छोड़ देता है।


    डायबिटीज़ में भोजन छोड़ने का प्रभाव

    हमारा शरीर एक नियमित जैविक चक्र (बायोलॉजिकल रिद्म) पर काम करता है। तय समय पर भोजन करने से भूख से जुड़े हार्मोन सक्रिय होते हैं और शरीर ऊर्जा की अपेक्षा करता है।

    यदि कोई व्यक्ति भोजन मिस कर देता है, लेकिन दवा या इंसुलिन ले चुका है, तो ब्लड ग्लूकोज़ का स्तर तेजी से गिर सकता है। इस स्थिति को हाइपोग्लाइसीमिया (लो ब्लड शुगर) कहा जाता है।

    शरीर और विशेष रूप से मस्तिष्क को लगातार ग्लूकोज़ की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक पर्याप्त ग्लूकोज़ न मिलने पर मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, जो गंभीर परिणाम दे सकती है।


    डायबिटीज़ में भोजन का सही अंतराल

    हर व्यक्ति की उम्र, वजन, दवाइयों और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डाइट प्लान अलग हो सकता है। इसलिए व्यक्तिगत आहार योजना के लिए डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह लेना आवश्यक है।

    सामान्यतः:

    • दिन में तीन मुख्य भोजन – नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना।

    • इनके बीच 2–3 हल्के स्नैक्स।

    • स्नैक्स लगभग 100–150 कैलोरी के हो सकते हैं।

    • मुख्य भोजन 300–450 कैलोरी के आसपास हो सकता है (व्यक्ति विशेष के अनुसार बदलाव संभव है)।

    नियमित अंतराल पर भोजन करने से ब्लड शुगर संतुलित रखने में मदद मिलती है।


    लो शुगर के लक्षण: किन संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें

    हाइपोग्लाइसीमिया के लक्षण दो प्रकार के हो सकते हैं:

    1. शारीरिक (ऑटोनोमिक) संकेत

    ये शरीर की शुरुआती चेतावनी होते हैं:

    • हाथों में कंपकंपी

    • अचानक तेज भूख लगना

    • अत्यधिक पसीना

    • दिल की धड़कन तेज होना

    • घबराहट या बेचैनी

    • शरीर में झनझनाहट

    ये संकेत बताते हैं कि तुरंत कुछ खा लेना चाहिए।

    2. मस्तिष्क से जुड़े (न्यूरोग्लाइकोपेनिक) लक्षण

    ये ज्यादा गंभीर और संभावित रूप से जानलेवा हो सकते हैं:

    • चक्कर आना

    • बोलने में दिक्कत

    • भ्रम या ध्यान में कमी

    • बेहोशी

    • दौरे पड़ना

    • कोमा

    लंबे समय तक लो शुगर रहने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।


    लो शुगर से बचाव कैसे करें?

    • दवा और इंसुलिन डॉक्टर द्वारा बताए गए समय पर लें।

    • भोजन कभी न छोड़ें।

    • लंबा उपवास या अत्यधिक शारीरिक मेहनत से बचें।

    • अपने साथ हल्का स्नैक या ग्लूकोज़ टैबलेट रखें, खासकर बाहर जाते समय।

    • नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच कराते रहें।

    डायबिटीज़ का प्रबंधन केवल दवाओं से नहीं, बल्कि संतुलित आहार और नियमित जीवनशैली से भी जुड़ा है।


    महत्वपूर्ण सूचना

    यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी प्रकार की दवा, आहार या उपचार संबंधी निर्णय लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें। स्वयं दवा लेना या इलाज में बदलाव करना हानिकारक हो सकता है।