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मालवांचल मित्र | विशेष रिपोर्ट कभी-कभी इतिहास की किताबों में दर्ज कुछ नाम इतने बड़े होते हैं कि उनके सामने पद, पैसा और सत्ता—सब छोटे लगने लगते हैं। डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस भी ऐसा ही एक नाम हैं। भारत में शायद उनकी चर्चा सीमित हो, लेकिन चीन में आज भी उनका नाम सम्मान और कृतज्ञता के साथ लिया जाता है। कहा जाता है कि चीन में डॉ. कोटनीस को सिर्फ एक भारतीय डॉक्टर के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे दोस्त के रूप में याद किया जाता है, जिसने मुश्किल वक्त में बिना किसी स्वार्थ के चीन का साथ दिया। उनकी कहानी आज भी चीन और भारत के रिश्तों में मानवीय दोस्ती की एक मिसाल मानी जाती है। जब चीन ने भारत से मांगी थी मदद कहानी शुरू होती है 1937-38 के दौर से, जब जापान के चीन पर हमले के कारण वहां भयानक युद्ध छिड़ा हुआ था। बड़ी संख्या में सैनिक और नागरिक घायल हो रहे थे और चिकित्सा सुविधाएं बेहद सीमित थीं। चीनी नेतृत्व की ओर से भारत से चिकित्सा सहायता भेजने की अपील की गई। उस समय भारत खुद ब्रिटिश शासन के अधीन था, लेकिन चीन की मदद के लिए भारतीय समाज में समर्थन जुटाया गया। इसी प्रयास के तहत भारतीय डॉक्टरों की एक मेडिकल टीम चीन भेजी गई। इस टीम में पांच डॉक्टर शामिल थे—डॉ. एम. अटल, डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस, डॉ. बेजोनजी बसु, डॉ. मुकुंदलाल मुखर्जी और डॉ. चारुलता मुखर्जी। इनमें डॉ. कोटनीस की कहानी सबसे अलग बन गई। 28 साल का डॉक्टर और हजारों मील दूर एक अनजान देश महाराष्ट्र के सोलापुर में जन्मे द्वारकानाथ कोटनीस उस समय करीब 28 वर्ष के थे। उनके सामने जिंदगी की सामान्य राह थी—डॉक्टरी करना, परिवार बसाना और अपने देश में काम करना। लेकिन उन्होंने युद्धग्रस्त चीन जाने का फैसला किया। समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने चीनी भाषा सीखना शुरू किया। सोचिए, आज हम विदेश जाते हैं तो पहले होटल की बुकिंग, इंटरनेट और मोबाइल सिम की चिंता करते हैं। उस दौर में यह डॉक्टर हजारों किलोमीटर दूर युद्ध क्षेत्र में जा रहा था और रास्ते में मरीजों से संवाद करने के लिए नई भाषा सीख रहा था। यही फर्क था—उनके लिए यह कोई विदेश यात्रा नहीं, एक मानवीय मिशन था।
चीन पहुंचकर शुरू हुआ असली संघर्ष चीन पहुंचने के बाद डॉ. कोटनीस ने घायल सैनिकों के इलाज में खुद को झोंक दिया। युद्ध का माहौल था, संसाधन सीमित थे और मरीज लगातार आ रहे थे। उन्होंने चीन के शांक्सी क्षेत्र में चिकित्सा सेवाएं दीं और बाद में चीनी सेना के साथ काम किया। लंबे समय तक लगातार काम करने के कारण उनका स्वास्थ्य भी प्रभावित हुआ, लेकिन उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा। उनकी सबसे बड़ी पहचान यही बनी कि वे मरीज को सिर्फ एक सैनिक या संख्या की तरह नहीं देखते थे—वह उनके लिए इंसान था। फिर चीन में मिला जीवनसाथी चीन में रहते हुए डॉ. कोटनीस की मुलाकात गुओ छिंगलान से हुई। दोनों का विवाह हुआ और उनका एक पुत्र हुआ, जिसका नाम यिनहुआ रखा गया। लेकिन इतिहास ने इस परिवार को ज्यादा समय नहीं दिया। लगातार काम, युद्धकालीन परिस्थितियों और अत्यधिक तनाव के बीच डॉ. कोटनीस की तबीयत बिगड़ती गई। उन्हें मिर्गी के दौरे पड़ने लगे। आखिरकार 9 दिसंबर 1942 को मात्र 32 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। एक युवा डॉक्टर, जिसने भारत से हजारों किलोमीटर दूर जाकर चीन के घायल लोगों की सेवा की थी, वहीं हमेशा के लिए सो गया। माओ त्से तुंग ने भी जताया था दुख डॉ. कोटनीस के निधन से चीनी नेतृत्व भी बेहद दुखी हुआ। माओ त्से तुंग सहित चीन के शीर्ष नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। उनकी मृत्यु को चीन ने सिर्फ एक डॉक्टर की मौत नहीं माना, बल्कि युद्ध के कठिन समय में मिले एक सच्चे मित्र की विदाई के रूप में देखा। यही वजह है कि आज भी चीन में डॉ. कोटनीस का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।
चीन ने इस भारतीय को भुलाया नहीं डॉ. कोटनीस की याद चीन में अलग-अलग तरीकों से जीवित रखी गई है। उनके नाम से संस्थान जुड़े हैं, उनकी स्मृति में स्मारक हैं और उनकी कहानी चीन की कई पीढ़ियों तक पहुंची है। द्वारकानाथ कोटनीस मेमोरियल और उनके जीवन से जुड़े स्मृति स्थलों पर आज भी लोग उनके बारे में जानकारी लेते हैं। उनकी कहानी पर चीन में फिल्म भी बनाई गई—“Dr. Kotnis Ki Amar Kahani”—जिसने भारत और चीन के बीच उस दौर की मानवीय दोस्ती को दुनिया के सामने रखा।
आज भी क्यों याद किए जाते हैं कोटनीस? यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति को महान बनाने के लिए जरूरी नहीं कि उसके पास कोई बड़ा पद हो। कभी-कभी महानता इस बात में होती है कि जब दुनिया अपने स्वार्थ में उलझी हो, तब कोई इंसान दूसरे इंसान के दर्द को अपना दर्द समझकर उसके पास खड़ा हो जाए। डॉ. कोटनीस ने यही किया। उन्होंने चीन में पैसा कमाने या प्रसिद्धि पाने के लिए कदम नहीं रखा था। वह एक डॉक्टर बनकर गए थे और आखिर तक डॉक्टर ही बने रहे—घायलों का इलाज करते हुए, लगातार काम करते हुए और अंततः उसी सेवा में अपनी जिंदगी गंवाते हुए। एक कहानी जो भारत को भी याद रखनी चाहिए विडंबना यह है कि भारत में डॉ. कोटनीस का नाम उतना चर्चित नहीं है, जितना चीन में। हमारे यहां इतिहास के पन्नों पर कई नाम राजनीतिक बहसों के बीच चमकते और धुंधले होते रहते हैं। लेकिन डॉ. कोटनीस जैसे लोग किसी राजनीतिक खांचे में आसानी से फिट नहीं बैठते। उनकी कहानी राजनीति से बड़ी है। यह कहानी बताती है कि भारत की पहचान सिर्फ युद्ध करने वाले योद्धाओं से नहीं, बल्कि मानवता की सेवा करने वाले डॉक्टरों से भी बनी है। डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस की कहानी भारत और चीन के रिश्तों का वह पन्ना है, जिसे सीमा विवाद, राजनीति और बदलते कूटनीतिक समीकरणों से अलग पढ़ने की जरूरत है। आज भारत और चीन के संबंधों में चाहे कितनी भी तल्खियां क्यों न हों, करीब नौ दशक पहले एक भारतीय डॉक्टर ने चीन के मुश्किल वक्त में जो सेवा की, उसकी याद वहां आज भी मौजूद है। सरहदें देशों को अलग कर सकती हैं, लेकिन इंसानियत की सेवा की कहानी सरहदों से बड़ी होती है। डॉ. कोटनीस की जिंदगी का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है— |
मालवांचल मित्र | विशेष रिपोर्ट
कभी-कभी इतिहास की किताबों में दर्ज कुछ नाम इतने बड़े होते हैं कि उनके सामने पद, पैसा और सत्ता—सब छोटे लगने लगते हैं। डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस भी ऐसा ही एक नाम हैं। भारत में शायद उनकी चर्चा सीमित हो, लेकिन चीन में आज भी उनका नाम सम्मान और कृतज्ञता के साथ लिया जाता है।
कहा जाता है कि चीन में डॉ. कोटनीस को सिर्फ एक भारतीय डॉक्टर के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे दोस्त के रूप में याद किया जाता है, जिसने मुश्किल वक्त में बिना किसी स्वार्थ के चीन का साथ दिया। उनकी कहानी आज भी चीन और भारत के रिश्तों में मानवीय दोस्ती की एक मिसाल मानी जाती है।
जब चीन ने भारत से मांगी थी मदद
कहानी शुरू होती है 1937-38 के दौर से, जब जापान के चीन पर हमले के कारण वहां भयानक युद्ध छिड़ा हुआ था। बड़ी संख्या में सैनिक और नागरिक घायल हो रहे थे और चिकित्सा सुविधाएं बेहद सीमित थीं।
चीनी नेतृत्व की ओर से भारत से चिकित्सा सहायता भेजने की अपील की गई। उस समय भारत खुद ब्रिटिश शासन के अधीन था, लेकिन चीन की मदद के लिए भारतीय समाज में समर्थन जुटाया गया।
इसी प्रयास के तहत भारतीय डॉक्टरों की एक मेडिकल टीम चीन भेजी गई। इस टीम में पांच डॉक्टर शामिल थे—डॉ. एम. अटल, डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस, डॉ. बेजोनजी बसु, डॉ. मुकुंदलाल मुखर्जी और डॉ. चारुलता मुखर्जी।
इनमें डॉ. कोटनीस की कहानी सबसे अलग बन गई।
28 साल का डॉक्टर और हजारों मील दूर एक अनजान देश
महाराष्ट्र के सोलापुर में जन्मे द्वारकानाथ कोटनीस उस समय करीब 28 वर्ष के थे। उनके सामने जिंदगी की सामान्य राह थी—डॉक्टरी करना, परिवार बसाना और अपने देश में काम करना।
लेकिन उन्होंने युद्धग्रस्त चीन जाने का फैसला किया।
समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने चीनी भाषा सीखना शुरू किया। सोचिए, आज हम विदेश जाते हैं तो पहले होटल की बुकिंग, इंटरनेट और मोबाइल सिम की चिंता करते हैं। उस दौर में यह डॉक्टर हजारों किलोमीटर दूर युद्ध क्षेत्र में जा रहा था और रास्ते में मरीजों से संवाद करने के लिए नई भाषा सीख रहा था।
यही फर्क था—उनके लिए यह कोई विदेश यात्रा नहीं, एक मानवीय मिशन था।

चीन पहुंचकर शुरू हुआ असली संघर्ष
चीन पहुंचने के बाद डॉ. कोटनीस ने घायल सैनिकों के इलाज में खुद को झोंक दिया। युद्ध का माहौल था, संसाधन सीमित थे और मरीज लगातार आ रहे थे।
उन्होंने चीन के शांक्सी क्षेत्र में चिकित्सा सेवाएं दीं और बाद में चीनी सेना के साथ काम किया। लंबे समय तक लगातार काम करने के कारण उनका स्वास्थ्य भी प्रभावित हुआ, लेकिन उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा।
उनकी सबसे बड़ी पहचान यही बनी कि वे मरीज को सिर्फ एक सैनिक या संख्या की तरह नहीं देखते थे—वह उनके लिए इंसान था।
फिर चीन में मिला जीवनसाथी
चीन में रहते हुए डॉ. कोटनीस की मुलाकात गुओ छिंगलान से हुई। दोनों का विवाह हुआ और उनका एक पुत्र हुआ, जिसका नाम यिनहुआ रखा गया।
लेकिन इतिहास ने इस परिवार को ज्यादा समय नहीं दिया।
लगातार काम, युद्धकालीन परिस्थितियों और अत्यधिक तनाव के बीच डॉ. कोटनीस की तबीयत बिगड़ती गई। उन्हें मिर्गी के दौरे पड़ने लगे।
आखिरकार 9 दिसंबर 1942 को मात्र 32 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।
एक युवा डॉक्टर, जिसने भारत से हजारों किलोमीटर दूर जाकर चीन के घायल लोगों की सेवा की थी, वहीं हमेशा के लिए सो गया।
माओ त्से तुंग ने भी जताया था दुख
डॉ. कोटनीस के निधन से चीनी नेतृत्व भी बेहद दुखी हुआ। माओ त्से तुंग सहित चीन के शीर्ष नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।
उनकी मृत्यु को चीन ने सिर्फ एक डॉक्टर की मौत नहीं माना, बल्कि युद्ध के कठिन समय में मिले एक सच्चे मित्र की विदाई के रूप में देखा।
यही वजह है कि आज भी चीन में डॉ. कोटनीस का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

चीन ने इस भारतीय को भुलाया नहीं
डॉ. कोटनीस की याद चीन में अलग-अलग तरीकों से जीवित रखी गई है। उनके नाम से संस्थान जुड़े हैं, उनकी स्मृति में स्मारक हैं और उनकी कहानी चीन की कई पीढ़ियों तक पहुंची है।
द्वारकानाथ कोटनीस मेमोरियल और उनके जीवन से जुड़े स्मृति स्थलों पर आज भी लोग उनके बारे में जानकारी लेते हैं।
उनकी कहानी पर चीन में फिल्म भी बनाई गई—“Dr. Kotnis Ki Amar Kahani”—जिसने भारत और चीन के बीच उस दौर की मानवीय दोस्ती को दुनिया के सामने रखा।

आज भी क्यों याद किए जाते हैं कोटनीस?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।
किसी व्यक्ति को महान बनाने के लिए जरूरी नहीं कि उसके पास कोई बड़ा पद हो। कभी-कभी महानता इस बात में होती है कि जब दुनिया अपने स्वार्थ में उलझी हो, तब कोई इंसान दूसरे इंसान के दर्द को अपना दर्द समझकर उसके पास खड़ा हो जाए।
डॉ. कोटनीस ने यही किया।
उन्होंने चीन में पैसा कमाने या प्रसिद्धि पाने के लिए कदम नहीं रखा था। वह एक डॉक्टर बनकर गए थे और आखिर तक डॉक्टर ही बने रहे—घायलों का इलाज करते हुए, लगातार काम करते हुए और अंततः उसी सेवा में अपनी जिंदगी गंवाते हुए।
एक कहानी जो भारत को भी याद रखनी चाहिए
विडंबना यह है कि भारत में डॉ. कोटनीस का नाम उतना चर्चित नहीं है, जितना चीन में।
हमारे यहां इतिहास के पन्नों पर कई नाम राजनीतिक बहसों के बीच चमकते और धुंधले होते रहते हैं। लेकिन डॉ. कोटनीस जैसे लोग किसी राजनीतिक खांचे में आसानी से फिट नहीं बैठते।
उनकी कहानी राजनीति से बड़ी है।
यह कहानी बताती है कि भारत की पहचान सिर्फ युद्ध करने वाले योद्धाओं से नहीं, बल्कि मानवता की सेवा करने वाले डॉक्टरों से भी बनी है।
डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस की कहानी भारत और चीन के रिश्तों का वह पन्ना है, जिसे सीमा विवाद, राजनीति और बदलते कूटनीतिक समीकरणों से अलग पढ़ने की जरूरत है।
आज भारत और चीन के संबंधों में चाहे कितनी भी तल्खियां क्यों न हों, करीब नौ दशक पहले एक भारतीय डॉक्टर ने चीन के मुश्किल वक्त में जो सेवा की, उसकी याद वहां आज भी मौजूद है।
सरहदें देशों को अलग कर सकती हैं, लेकिन इंसानियत की सेवा की कहानी सरहदों से बड़ी होती है।
डॉ. कोटनीस की जिंदगी का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—
नाम कितना बड़ा हुआ, यह इतिहास तय करता है; लेकिन इंसान कितना बड़ा था, यह उसके किए हुए काम बताते हैं।